ज्ञान भारतम मिशन से जुड़े: जानिए कैसे हो रहा है प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटल पुनर्जागरण
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Toggleभारत एक ऐसा देश है जिसकी सांस्कृतिक विरासत हजारों वर्षों में फैली हुई है। इस विरासत का एक महत्वपूर्ण भाग हैं हमारी प्राचीन पांडुलिपियाँ। ये पांडुलिपियाँ केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, ज्योतिष, वास्तु, नाट्यशास्त्र, भाषा-विज्ञान, और दर्शन जैसे अनेक विषयों की बेशकीमती जानकारी अपने भीतर समेटे हुए हैं। इन्हीं अमूल्य धरोहरों को संरक्षित और सबके लिए सुलभ बनाने के लिए भारत सरकार ने ज्ञान भारतम मिशन की शुरुआत की है।

ज्ञान भारतम मिशन क्या है?
ज्ञान भारतम मिशन संस्कृति मंत्रालय के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय स्तर की पहल है, जिसका उद्देश्य है – भारत की एक करोड़ से अधिक प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण, संरक्षण और डिजिटलीकरण करना। यह मिशन देश के कोने-कोने में बिखरी हुई उन पांडुलिपियों को एकत्र कर उन्हें डिजिटल रूप में संरक्षित करता है, जो आज तक सामान्य जन से छुपी हुई थीं।
इस मिशन के माध्यम से सरकार न केवल शैक्षणिक संस्थानों और संग्रहालयों में मौजूद पांडुलिपियों को, बल्कि निजी संग्रहों में छिपी दुर्लभ सामग्री को भी सामने लाना चाहती है।
मिशन के प्रमुख उद्देश्य
ज्ञान भारतम मिशन के निम्नलिखित पांच मूल उद्देश्य हैं:
1. सर्वेक्षण (Survey): देश भर में मौजूद पांडुलिपियों की खोज और उनकी सूची बनाना।
2. दस्तावेजीकरण (Documentation): हर पांडुलिपि की भाषा, लिपि, काल, विषयवस्तु आदि की वैज्ञानिक जानकारी को रिकॉर्ड करना।
3. संरक्षण (Preservation): पुरानी और क्षीण हो चुकी पांडुलिपियों की मरम्मत और भंडारण की व्यवस्था।
4. डिजिटलीकरण (Digitization): स्कैनिंग, टेक्स्ट कन्वर्ज़न और डिजिटल संग्रहण के माध्यम से इन्हें इंटरनेट पर उपलब्ध कराना।
5. सार्वजनिक पहुंच (Public Access): एक ऐसा डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म तैयार करना, जहाँ कोई भी शोधार्थी या आम नागरिक इन पांडुलिपियों को पढ़ सके।
क्यों जरूरी है ज्ञान भारतम मिशन?
भारत की अनेक प्राचीन पांडुलिपियाँ अब नष्ट होने की कगार पर हैं। समय के साथ-साथ उनका कागज़, ताड़पत्र, या कपड़े पर लिखा गया लेख मिटता जा रहा है। कई बार तो इन्हें पढ़ने वाले विद्वान भी अब मौजूद नहीं हैं। ऐसे में, ज्ञान भारतम मिशन न केवल इस बौद्धिक सम्पदा को बचाने की पहल है, बल्कि यह भारत को फिर से “ज्ञान का विश्वगुरु” बनाने की दिशा में एक ठोस कदम भी है।
डिजिटलीकरण कैसे किया जा रहा है?
ज्ञान भारतम मिशन के अंतर्गत डिजिटलीकरण की प्रक्रिया बेहद वैज्ञानिक और आधुनिक तकनीकों के माध्यम से की जा रही है:
स्कैनिंग: उच्च गुणवत्ता वाले स्कैनर्स से पांडुलिपियों की इमेज कैप्चर की जाती है।
OCR टेक्नोलॉजी: पुराने लिपियों को डिजिटल टेक्स्ट में बदलने के लिए AI आधारित OCR (Optical Character Recognition) तकनीक का प्रयोग किया जाता है।
Metadata Tagging: हर पांडुलिपि की विषयवस्तु, लेखक, भाषा, युग, स्थान आदि को टैग किया जाता है।
डेटा संरचना: सभी दस्तावेजों को एक केंद्रीकृत डिजिटल लाइब्रेरी में संरक्षित किया जाता है।
किन संस्थाओं की भागीदारी है?
ज्ञान भारतम मिशन में निम्नलिखित संस्थाएँ सक्रिय भागीदार हैं:
राष्ट्रीय अभिलेखागार
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र
विश्वविद्यालयों के शोध विभाग
स्थानीय संग्रहालय और निजी संग्रहकर्ता
ये संस्थान सरकार के साथ मिलकर पांडुलिपियों की पहचान, स्कैनिंग और अपलोडिंग का कार्य कर रहे हैं।
ज्ञान भारतम मिशन की कार्यप्रणाली: एक आधुनिक दृष्टिकोण
ज्ञान भारतम मिशन की कार्यप्रणाली को अत्याधुनिक तकनीकों से जोड़ा गया है ताकि डिजिटलीकरण का कार्य उच्च गुणवत्ता, सटीकता और स्थायित्व के साथ पूरा हो सके। इस प्रक्रिया को हम चार मुख्य चरणों में समझ सकते हैं:
सर्वेक्षण और संग्रहण
सबसे पहले देश भर के पुस्तकालयों, मंदिरों, मठों, संग्रहालयों, गुरुकुलों, निजी संग्रहों में मौजूद पांडुलिपियों की पहचान की जाती है।
इसके लिए एक राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण टीम गठित की गई है जो फील्ड में जाकर पांडुलिपियों की स्थिति, संख्या और प्रकार की जानकारी इकट्ठा करती है।
यह चरण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि बहुत सी पांडुलिपियाँ आज भी गाँवों के मंदिरों या निजी घरों में बिना देखभाल के रखी हुई हैं।
दस्तावेजीकरण और श्रेणीकरण
हर पांडुलिपि का विज्ञानसम्मत दस्तावेजीकरण किया जाता है – जिसमें भाषा, लिपि, काल, लेखक, विषयवस्तु, काग़ज़ या ताड़पत्र का प्रकार, क्षति की स्थिति जैसी सूचनाएँ शामिल होती हैं।
इसके बाद विषय आधारित वर्गीकरण किया जाता है, जैसे – आयुर्वेद, दर्शन, वेद, गणित, खगोल, संगीत, नाटक आदि।
डिजिटलीकरण और तकनीकी प्रोसेसिंग
प्रत्येक पांडुलिपि की उच्च गुणवत्ता में स्कैनिंग की जाती है, जिससे मूल छवि संरक्षित हो सके।
इसके बाद AI आधारित OCR तकनीक का प्रयोग करके टेक्स्ट को डिजिटल फॉर्म में बदला जाता है।
OCR तकनीक को विशेष रूप से भारतीय भाषाओं और लिपियों जैसे देवनागरी, ब्राह्मी, शारदा, तमिल, ग्रंथ, कन्नड़ आदि के लिए विकसित किया गया है।
डिजिटल रिपॉजिटरी और सार्वजनिक उपयोग
डिजिटाइज्ड पांडुलिपियों को एक नेशनल डिजिटल मैन्युस्क्रिप्ट रिपॉजिटरी में संग्रहित किया जाता है।
एक ऐसा पोर्टल तैयार किया गया है, जहाँ छात्र, शोधकर्ता और आम नागरिक इन पांडुलिपियों को पढ़ सकते हैं, डाउनलोड कर सकते हैं या शोध हेतु प्रयोग कर सकते हैं।
इस प्रक्रिया के माध्यम से ज्ञान भारतम मिशन ने ज्ञान को केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे लोकप्रिय उपयोग तक पहुँचाया है।
तकनीकी विशेषताएँ: विज्ञान और संस्कृति का संगम
ज्ञान भारतम मिशन में आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इसमें निम्नलिखित प्रमुख तकनीकी टूल्स का प्रयोग किया जा रहा है:
🔹 AI और Machine Learning
OCR तकनीक को AI की मदद से संवेदनशील बनाया गया है ताकि विभिन्न लिपियों को पढ़ा जा सके।
Machine Learning आधारित correction tools भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं जो OCR त्रुटियों को सुधारते हैं।
🔹 Cloud Storage
डिजिटाइज्ड डेटा को सुरक्षित रखने के लिए cloud-based servers का उपयोग किया जा रहा है।
इससे लाखों पृष्ठ एकसाथ संग्रहित और सुरक्षित रखे जा सकते हैं।
🔹 Blockchain तकनीक
पांडुलिपियों की पहचान, मूल स्वामित्व और इतिहास को ट्रैक करने के लिए blockchain आधारित प्रणाली अपनाई गई है।
इससे छेड़छाड़ की कोई संभावना नहीं रहती।
🔹 AR/VR तकनीक
कुछ प्रमुख पांडुलिपियों को वर्चुअल रियलिटी के माध्यम से 3D मोड में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे पाठकों को एक जीवंत अनुभव हो सके।
इन सबके माध्यम से ज्ञान भारतम मिशन को एक फ्यूचर-रेडी और टेक्नोलॉजी-समर्थ मिशन के रूप में स्थापित किया जा रहा है।

प्रमुख चुनौतियाँ और समाधान
हर बड़े मिशन की तरह ज्ञान भारतम मिशन को भी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आइए इन्हें समझते हैं:
1. पांडुलिपियों की भौतिक स्थिति
बहुत सी पांडुलिपियाँ अत्यंत क्षीण अवस्था में हैं। वे फटे हुए, धूमिल हो चुके या घुन लगे पन्नों में बदल चुकी हैं।
समाधान: संरक्षण प्रयोगशालाओं (Conservation Labs) की स्थापना की जा रही है जहाँ पांडुलिपियों की मरम्मत और रिस्टोरेशन की जा सके।
2. भाषा और लिपि की विविधता
भारत में दर्जनों लिपियाँ और सैकड़ों भाषाएँ रही हैं, जिनकी पांडुलिपियाँ अलग-अलग ढंग से लिखी गई हैं।
समाधान: विशेषज्ञों की टीम बनाई गई है, जिनमें भाषाविद्, संस्कृतज्ञ, तामिल-तेलुगु स्कॉलर, और पांडुलिपि-पठन में पारंगत लोग शामिल हैं।
3. निजी संग्रहों तक पहुँच
कई पांडुलिपियाँ आज भी परिवारों या मठों के पास बंद अलमारियों में हैं। कई बार वे इन्हें साझा नहीं करना चाहते।
समाधान: प्रोत्साहन योजना, जिसमें निजी संग्रहकर्ताओं को पहचान पत्र, प्रमाणपत्र और उनके नाम से डिजिटल श्रेय दिया जाता है।
अब तक की उपलब्धियाँ (2025 तक)
श्रेणी आँकड़े
डिजिटाइज्ड पांडुलिपियाँ 24,00,000+
डिजिटाइज्ड पृष्ठ 15 करोड़+
भागीदार संस्थाएँ 500+
राज्यों में कार्यरत टीमें 28
भाषाओं में पांडुलिपियाँ 60+
वैश्विक महत्व: भारत को फिर से “ज्ञान का केंद्र” बनाने की ओर
ज्ञान भारतम मिशन केवल एक डिजिटलीकरण परियोजना नहीं, बल्कि यह भारत को उसकी बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास है। यह मिशन वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान को पुनः स्थापित कर रहा है – एक ऐसे देश के रूप में जो प्राचीन काल में भी विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, और दर्शन का नेतृत्व करता था।
इस मिशन के माध्यम से भारत:
अपनी दुर्लभ पांडुलिपियाँ अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के लिए खोल रहा है।
भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System – IKS) को शिक्षा नीति में भी समाहित किया जा रहा है।
वैश्विक मंचों पर भारत की सांस्कृतिक राजनय (Cultural Diplomacy) को सशक्त बना रहा है।
शैक्षणिक योगदान
ज्ञान भारतम मिशन ने भारत के शोधार्थियों, पीएचडी विद्वानों, शिक्षकों और विद्यार्थियों को अमूल्य संसाधनों तक डिजिटल पहुँच प्रदान की है।
योगदान:
संस्कृत, पालि, प्राकृत, फारसी, अरबी जैसी भाषाओं की पांडुलिपियाँ अब शोध के लिए उपलब्ध हैं।
विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में Indian Manuscript Studies जैसे नए पाठ्यक्रम शुरू हुए हैं।
डिजिटल पांडुलिपियों को पढ़ने के लिए स्कॉलर-फ्रेंडली प्लेटफॉर्म तैयार किए गए हैं, जहाँ वे टिप्पणियाँ, अनुवाद और व्याख्या जोड़ सकते हैं।
इससे शिक्षा का स्तर भी उच्चतर हुआ है, और भारतीय ज्ञान परंपरा की समझ गहरी होती जा रही है।
लोक सहभागिता और जनजागरूकता
ज्ञान भारतम मिशन की एक बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ सरकारी या संस्थागत कार्य नहीं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी से चल रहा है। देश भर में “पांडुलिपि मित्र” (Manuscript Mitra) बनाए गए हैं जो गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं।
जनभागीदारी के उदाहरण:
कई ग्रामीणों ने अपने पूर्वजों की पांडुलिपियाँ सरकार को सौंपी हैं।
लोक कलाकारों, कारीगरों, पुरोहितों और मंदिरों के पुजारियों ने भी अपने संग्रह साझा किए।
स्कूलों और कॉलेजों में “ज्ञान भारतम सप्ताह” जैसे आयोजन कर जनचेतना फैलाई जा रही है।
इससे यह साबित होता है कि ज्ञान भारतम मिशन एक “जन-अभियान” बन गया है।
निष्कर्ष: भारत के प्राचीन ज्ञान का पुनर्जागरण
ज्ञान भारतम मिशन न केवल एक डिजिटलीकरण परियोजना है, बल्कि यह भारत की आत्मा से जुड़ा एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण आंदोलन है। यह मिशन हमारी उस धरोहर को संरक्षित कर रहा है, जो सदियों से हमारी ज्ञान परंपरा की नींव रही है – चाहे वह वेदों की ऋचाएं हों, चरक संहिता का आयुर्वेद ज्ञान हो, भास का नाट्यशास्त्र हो या भास्कराचार्य का खगोल विज्ञान।
इस मिशन के माध्यम से:
करोड़ों दुर्लभ पांडुलिपियाँ अब नष्ट होने से बचाई जा रही हैं।
आम नागरिक, विद्यार्थी और शोधकर्ता एक क्लिक पर प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणाली से जुड़ पा रहे हैं।
यह मिशन भारत को वैश्विक पटल पर फिर से एक ज्ञान-प्रधान राष्ट्र के रूप में स्थापित कर रहा है।
ज्ञान भारतम मिशन यह संदेश देता है कि भारत की पहचान केवल आधुनिक तकनीक या आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान परंपरा के संरक्षण से भी बनती है।
आज जब दुनिया वैदिक गणित, योग, संस्कृत, और भारतीय दर्शन की ओर आकर्षित हो रही है, तब भारत के पास इनका प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए सबसे मजबूत माध्यम यही है – डिजिटलीकृत पांडुलिपियाँ।
इसलिए अब यह केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि हम सभी का उत्तरदायित्व है कि इस मिशन को जन-आंदोलन बनाएं:
🔹 यदि आपके पास कोई पुरानी पांडुलिपि है, तो उसे साझा करें।
🔹 शोधार्थी बनें, अनुवाद करें, व्याख्या करें।
🔹 स्कूलों और संस्थानों में “ज्ञान भारतम सप्ताह” मनाएं।
🔹 और सबसे बढ़कर – भारत की ज्ञान-सम्पदा पर गर्व करें।
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