राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2025: हथकरघा से आत्मनिर्भर भारत तक का सफर
प्रस्तावना: राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व
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Toggleभारत का हथकरघा उद्योग केवल एक व्यवसाय नहीं है, यह हमारी सांस्कृतिक पहचान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, और लोक कलाओं की आत्मा है। हर वर्ष 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है ताकि इस परंपरा, इसके योगदान, और इससे जुड़े कारीगरों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और सम्मान मिल सके। वर्ष 2025 में, यह 11वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने की।
इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य है – भारत के जीवंत हथकरघा क्षेत्र को एक नई दिशा देना, उसे वैश्विक पहचान दिलाना, और इसे आत्मनिर्भर भारत के निर्माण से जोड़ना।

वर्तमान में जब भारत डिजिटल युग में प्रवेश कर चुका है, वहीं राष्ट्रीय हथकरघा दिवस यह याद दिलाता है कि लोकल हस्तशिल्प और पारंपरिक कारीगरी हमारी जड़ों से जुड़े रहने का सबसे सुंदर तरीका है।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस सिर्फ एक तिथि नहीं, बल्कि यह एक आंदोलन बन चुका है जिसमें लाखों बुनकर, शिल्पकार, महिलाएं और युवा भाग ले रहे हैं। यह दिन उस समर्पण और मेहनत का प्रतीक है, जिससे भारत के गांव-गांव में हथकरघा की बुनावट होती है – हर धागे में एक कहानी बुनी जाती है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का इस अवसर पर उपस्थित होना न केवल इस दिवस की गरिमा बढ़ाता है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी देता है कि राष्ट्रीय हथकरघा दिवस अब सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा, यह अब नीति-निर्माण का केंद्र बन चुका है।
11वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस: कब और कहाँ
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2025 का आयोजन 7 अगस्त को नई दिल्ली के भारत मंडपम में भव्य रूप से किया गया। यह स्थान भारत सरकार द्वारा विकसित प्रगति मैदान में स्थित है, जो विश्वस्तरीय प्रदर्शनियों और राष्ट्रीय आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है।
इस वर्ष का आयोजन विशेष इसलिए भी था क्योंकि यह राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का 11वां संस्करण था – एक दशक से अधिक की यात्रा का प्रतीक।
इस आयोजन की मुख्य अतिथि थीं – भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु, जिन्होंने समारोह की अध्यक्षता करते हुए देशभर से आए बुनकरों, डिज़ाइनरों, शिल्पकारों और उद्योग से जुड़ी संस्थाओं को संबोधित किया। उनके साथ केंद्रीय वस्त्र और कपड़ा मंत्री, राज्य मंत्री, और सचिव स्तर के अधिकारी भी मंच पर उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के प्रमुख घटक:
हथकरघा उत्पादों की प्रदर्शनी: देश के विभिन्न राज्यों से आए बुनकरों ने अपने परंपरागत और आधुनिक डिज़ाइन प्रस्तुत किए।
राष्ट्रीय पुरस्कार वितरण: उल्लेखनीय कारीगरों को सम्मानित किया गया।
लाइव डेमोंस्ट्रेशन: बुनाई की तकनीक, कताई, डिज़ाइन और रंगाई की जीवंत प्रस्तुति।
डिजिटल पहल: ई-कॉमर्स मंच, जीआई टैगिंग और डिजिटलीकरण पर आधारित संवाद सत्र।
प्रतिभागियों में शामिल थे:
असम, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, तेलंगाना, जम्मू-कश्मीर आदि से आए बुनकर
प्रमुख हथकरघा सहकारी समितियाँ
एनआईएफटी, डिजाइन संस्थान और टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी
स्टार्टअप्स और महिला स्वयं सहायता समूह
इस आयोजन का उद्देश्य केवल परंपरा का जश्न मनाना नहीं था, बल्कि यह दिखाना भी था कि कैसे राष्ट्रीय हथकरघा दिवस भारत को आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ाने का माध्यम बन सकता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संबोधन: हथकरघा के स्वाभिमान को सम्मान
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2025 के इस भव्य आयोजन में भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने एक प्रेरणादायक संबोधन दिया, जिसमें उन्होंने हथकरघा क्षेत्र को आत्मनिर्भर भारत का आधार बताया। उनके भाषण में कई महत्वपूर्ण संदेश थे, जो न केवल कारीगरों के हौसले को बढ़ाते हैं, बल्कि सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाते हैं।
राष्ट्रपति के भाषण के मुख्य बिंदु:
1. हथकरघा क्षेत्र का गौरव
राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान में हथकरघा का अनमोल योगदान है। हर राज्य की बुनावट, रंग, डिज़ाइन और तकनीक भारत की विविधता और एकता को दर्शाते हैं।
2. महिलाओं की भागीदारी
उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि हथकरघा उद्योग में लाखों महिलाएं सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं। इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सशक्तिकरण को बल मिला है।
3. स्थानीय उत्पाद, वैश्विक पहचान
राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री के ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को समर्थन देते हुए कहा कि हथकरघा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने की आवश्यकता है।
4. पर्यावरण संरक्षण में योगदान
हथकरघा प्राकृतिक रेशों, हाथ से कताई, और रासायनिक रहित रंगों के उपयोग के कारण पर्यावरण के अनुकूल है।
5. सरकारी योजनाओं की सराहना
उन्होंने केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे कि PM-MITRA, Cluster Development Programme, और e-marketing initiatives की सराहना की और इनके प्रभाव को उल्लेखनीय बताया।
6. डिजिटल युग में बुनकरों की भूमिका
राष्ट्रपति ने युवा पीढ़ी को डिजिटल माध्यम से हथकरघा को आगे बढ़ाने का संदेश दिया, जिससे यह परंपरा आधुनिक तकनीक के साथ तालमेल बैठा सके।
राष्ट्रपति का संदेश:
“हथकरघा केवल वस्त्र नहीं बुनता, यह हमारे इतिहास, संस्कृति और स्वाभिमान की कहानी बुनता है। हम सभी का कर्तव्य है कि इस परंपरा को सहेजें और सशक्त बनाएं।” – राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु
हथकरघा उद्योग: भारत की आत्मा
भारत का हथकरघा उद्योग न केवल एक व्यवसाय है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत, कारीगरी की परंपरा और ग्रामीण जीवन की पहचान है।
प्राचीन काल से ही भारत के बुनकरों ने ऐसे कपड़े बनाए हैं, जो न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध हुए। चाहे वह बनारसी हो, कांजीवरम हो, चिकनकारी हो या पाटन पटोला – हर प्रकार की बुनाई भारत की बहु-आयामी संस्कृति को दर्शाती है।
भारत में हथकरघा की ऐतिहासिक यात्रा:
1. वैदिक काल से शुरूआत
पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि भारत में हथकरघा की परंपरा वैदिक युग से रही है। सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों में भी बुनाई की मौजूदगी स्पष्ट दिखती है।
2. मुगल काल में स्वर्ण युग
बुनकरों को शाही संरक्षण मिला, और कढ़ाई, ब्रोकेड, ज़री, और मलमल जैसे कपड़ों को प्रसिद्धि प्राप्त हुई। मुगल काल में भारतीय हथकरघा विश्व व्यापार का केंद्र बना।
3. ब्रिटिश शासन और ह्रास
ब्रिटिश काल में मशीनों के आने से हथकरघा उद्योग को भारी नुकसान हुआ। लेकिन गांधी जी के खादी आंदोलन ने इसे फिर से जीवंत किया।
4. आधुनिक पुनरुत्थान
स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने हथकरघा उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए योजनाएं लागू कीं, जैसे कि बुनकर सहकारी समितियां, हैंडलूम बोर्ड्स, और GI टैगिंग।

सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संरचना में योगदान
हथकरघा कला जाति, धर्म, और क्षेत्रीय भिन्नताओं को जोड़ती है।
यह अनेक समुदायों की पहचान और आजीविका का आधार है।
आज भी यह उद्योग लगभग 35 लाख परिवारों को रोजगार देता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भूमिका
हथकरघा उद्योग छोटे और सीमांत किसानों, मजदूरों और महिलाओं के लिए आय का स्थायी स्रोत है।
यह उद्योग स्थानीय संसाधनों का उपयोग करता है और कृषि-गैर कृषि अर्थव्यवस्था को जोड़ता है।
आत्मनिर्भर भारत की नींव
यह उद्योग स्वदेशी निर्माण का प्रतीक है, जो आयात पर निर्भरता घटाता है।
हथकरघा उत्पाद विदेशों में निर्यात होकर विदेशी मुद्रा कमाने का साधन बनते हैं।
आत्मनिर्भर भारत और हथकरघा: स्वदेशी से समृद्धि की ओर
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया “आत्मनिर्भर भारत” अभियान केवल एक आर्थिक दृष्टिकोण नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन भी है।
इस अभियान में हथकरघा उद्योग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस इस विचार को और मज़बूती देता है कि देश की समृद्धि स्थानीय कारीगरों और बुनकरों की मजबूती से जुड़ी है।
स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता
1. हथकरघा = स्वदेशी
हथकरघा वस्त्रों का निर्माण बिना किसी बाहरी मशीन या उपकरण के किया जाता है। यह पूरी तरह स्थानीय संसाधनों और मानव श्रम पर आधारित होता है, जो आत्मनिर्भरता की सर्वोच्च मिसाल है।
2. वोकल फॉर लोकल
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी अपने भाषण में इस पर बल दिया कि हमें स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देकर आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना होगा।
3. स्थानीय से वैश्विक
भारत के हथकरघा उत्पाद जैसे कि ब्रोकेड, बंधेज, पाटन पटोला, तंत साड़ियाँ, और चिकनकारी अब विश्व बाज़ारों में अपनी खास पहचान बना रहे हैं।
आर्थिक योगदान
भारत का हथकरघा क्षेत्र वस्त्र क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है।
यह उद्योग जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान देता है और निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित करता है।
सरकारी योजनाएँ और सहयोग
PM-MITRA पार्क, One District One Product (ODOP), Cluster Development Scheme जैसी योजनाएँ हथकरघा के विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं।
डिजिटल मार्केटिंग, Amazon, Flipkart जैसे मंचों पर हथकरघा उत्पादों की मौजूदगी भी बढ़ रही है।
सामाजिक समावेशन
महिलाओं, जनजातीय समूहों और पिछड़े वर्गों को हथकरघा उद्योग में प्रमुखता से रोजगार मिला है।
यह उन्हें आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ समाज में गरिमा प्रदान करता है।
कार्यक्रम की मुख्य झलकियाँ: कला, परंपरा और नवाचार का संगम
11वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था, यह भारत की पारंपरिक बुनाई, डिज़ाइन, और सांस्कृतिक विरासत को मंच देने वाला एक जीवंत उत्सव था।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस अवसर पर विविध प्रकार की गतिविधियाँ और प्रस्तुतियाँ आयोजित की गईं, जो न केवल बुनकरों और कारीगरों के लिए प्रेरणास्पद थीं, बल्कि दर्शकों और नीति-निर्माताओं के लिए भी सशक्त अनुभव रहीं।
प्रदर्शनी और लाइव डेमोंस्ट्रेशन
देशभर से आए 75 से अधिक हथकरघा क्लस्टर और 100+ बुनकरों ने अपने उत्पादों को प्रदर्शित किया।
लाइव बुनाई प्रदर्शन में जैसे – कांचीवरम, बनारसी, इकत, मणिपुरी, और नागालैंड की बुनाई प्रक्रियाओं को दिखाया गया।
राष्ट्रीय पुरस्कार वितरण
उत्कृष्ट कारीगरों को उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार प्रदान किए गए।
विशेष रूप से महिलाओं और युवा बुनकरों को पुरस्कृत कर नवाचार और सृजनशीलता को बढ़ावा दिया गया।
डिज़ाइन और नवाचार से भरी प्रदर्शनी
पारंपरिक डिज़ाइन के साथ-साथ नई तकनीकों और प्रयोगों को भी जगह दी गई जैसे – प्राकृतिक रंगों का उपयोग, जैविक वस्त्र, और डिज़िटल प्रिंटिंग के साथ हस्तनिर्मित संयोजन।
डिजिटल भारत – हथकरघा की नई उड़ान
ई-मार्केटिंग, GI टैगिंग और सोशल मीडिया के जरिए हथकरघा को कैसे ग्लोबल किया जा सकता है, इस पर संवाद सत्र आयोजित किए गए।
डिजिटल प्रशिक्षण केंद्रों की घोषणाएं भी की गईं ताकि बुनकर तकनीक के साथ आगे बढ़ सकें।
सहभागिता और समावेशन
कई राज्यों के महिला स्वयं सहायता समूह, युवा डिजाइन स्टार्टअप्स, NIFT के छात्रों और टेक्सटाइल विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से क्षेत्रीय परंपराओं की झलक दिखाई गई।
निष्कर्ष: राष्ट्रीय हथकरघा दिवस परंपरा से प्रगति की ओर
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस केवल एक दिन का आयोजन नहीं है, यह उस परंपरा, मेहनत और सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव है जो भारत को अद्वितीय बनाता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की अध्यक्षता में संपन्न हुआ यह 11वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस आयोजन एक सशक्त संदेश देता है कि भारत की आत्मा उसके गाँवों, बुनकरों और शिल्पकारों में बसती है।
हथकरघा उद्योग, जो पर्यावरण-सम्मत, रोजगार-सृजक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है, अब आत्मनिर्भर भारत की ओर तेजी से बढ़ रहा है। डिजिटल तकनीक, सरकारी योजनाएँ, और समाज का बढ़ता समर्थन इस क्षेत्र को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा रहा है।
आज आवश्यकता है कि हम सब मिलकर “वोकल फॉर लोकल” को व्यवहार में लाएँ, हथकरघा उत्पादों को अपनाएँ और बुनकरों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाएँ।
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