38वीं समानान्तर रेखा: उत्तर और दक्षिण कोरिया का पूरा इतिहास
प्रस्तावना: 38वीं समानान्तर रेखा
इतिहास हमें यह सिखाता है कि सीमाएँ केवल भूगोल का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि राजनीति, विचारधारा और संस्कृति का भी प्रतीक होती हैं। दुनिया में ऐसी कई सीमाएँ बनीं, लेकिन कोरियाई प्रायद्वीप को बांटने वाली 38वीं समानान्तर रेखा सबसे अलग है। यह रेखा एक साधारण नक्शे की रेखा नहीं, बल्कि पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच की वैचारिक खाई का प्रतीक है।
आज भी, जब दुनिया कई संघर्षों से उबर चुकी है, तब भी उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच यह रेखा न केवल भूगोल बल्कि तनाव, युद्ध और विभाजन की याद दिलाती है।
कोरिया का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
प्राचीन और मध्यकालीन कोरिया
कोरिया का इतिहास हजारों साल पुराना है। यहाँ गोगुरियो, शिला और बैक्जे जैसे प्राचीन राज्य बने। बाद में यह कोरिया साम्राज्य और फिर जोसोन वंश में एकीकृत हुआ।
कोरियाई संस्कृति पर कन्फ्यूशियस विचारधारा और बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव रहा।
19वीं सदी तक कोरिया एकीकृत और स्वतंत्र था।

जापानी उपनिवेश काल (1910–1945)
1910 में जापान ने कोरिया को अपने अधीन कर लिया। अगले 35 वर्षों तक:
कोरियाई लोगों की पहचान दबाई गई।
आर्थिक शोषण हुआ।
भाषा, संस्कृति और शिक्षा पर जापानी नियंत्रण थोप दिया गया।
कोरिया के लोग स्वतंत्रता की प्रतीक्षा कर रहे थे, और द्वितीय विश्व युद्ध का अंत उनके लिए एक अवसर लेकर आया।
द्वितीय विश्व युद्ध और कोरिया की आज़ादी
1945 में जापान की हार ने कोरिया को स्वतंत्रता दिलाई। लेकिन यह स्वतंत्रता अधूरी निकली, क्योंकि दो महाशक्तियाँ—सोवियत संघ और अमेरिका—ने यहाँ अपने प्रभाव को जमाना शुरू कर दिया।
विभाजन का प्रस्ताव
अमेरिका और सोवियत संघ ने जापान के आत्मसमर्पण की जिम्मेदारी को बांटने का निश्चय किया। इसके लिए 38वीं समानान्तर रेखा को आधार बनाया गया:
उत्तर का हिस्सा सोवियत संघ के नियंत्रण में आया।
दक्षिण का हिस्सा अमेरिका के नियंत्रण में गया।
अस्थायी निर्णय, स्थायी समस्या
यह विभाजन अस्थायी माना गया था, लेकिन जल्द ही यह स्थायी सीमा में बदल गया। यही वह क्षण था जब कोरिया दो हिस्सों में बंट गया।
38वीं समानान्तर रेखा का निर्माण
कैसे चुनी गई यह रेखा?
अमेरिका के दो अधिकारियों—डीन रसक और चार्ल्स बोनिस्टील—ने एक नक्शे पर नज़र डालकर यह सीमा निर्धारित की। उन्होंने देखा कि राजधानी सियोल को अमेरिकी हिस्से में रखना ज़रूरी है। परिणामस्वरूप, 38वीं समानान्तर रेखा खींची गई।
उत्तर और दक्षिण की सरकारें
उत्तर में: किम इल सुंग के नेतृत्व में साम्यवादी सरकार।
दक्षिण में: स्यंगमैन री के नेतृत्व में पूंजीवादी सरकार।
इस तरह कोरिया का राजनीतिक विभाजन पक्का हो गया।
कोरियाई युद्ध (1950–1953)
युद्ध की शुरुआत
25 जून 1950 को उत्तर कोरिया ने अचानक हमला किया। इसे “ऑपरेशन पोकपुंग” कहा गया। उत्तर की सेना ने 38वीं रेखा पार की और तेज़ी से दक्षिण की ओर बढ़ी।
संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका की प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र ने तत्काल कदम उठाते हुए अमेरिका की अगुवाई में बहुराष्ट्रीय सेना भेजी।
युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
पहली सियोल की लड़ाई (1950): उत्तर कोरिया ने राजधानी सियोल पर कब्ज़ा किया।
इंचोन लैंडिंग (1950): अमेरिका ने जवाबी हमला किया और स्थिति पलट दी।
चीनी हस्तक्षेप (1950): चीन ने उत्तर कोरिया की ओर से युद्ध में प्रवेश किया।
युद्ध का परिणाम
1953 में युद्धविराम समझौता हुआ।
एक नई सीमा बनाई गई—डिमिलिटराइज्ड ज़ोन (DMZ)।
परंतु, औपचारिक शांति संधि कभी नहीं हुई।
डिमिलिटराइज्ड ज़ोन (DMZ) – 38वीं समानान्तर का नया चेहरा
DMZ का निर्माण
लंबाई: लगभग 250 किमी
चौड़ाई: 4 किमी (दोनों ओर 2 किमी)
यह दुनिया की सबसे सुरक्षित और खतरनाक सीमा मानी जाती है।
पर्यावरण और वन्य जीवन
मानव गतिविधियों की कमी ने DMZ को प्राकृतिक आरक्षित क्षेत्र बना दिया है। यहाँ कई संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व
दक्षिण कोरिया ने यहाँ Dora Observatory बनाया है, जहाँ से पर्यटक उत्तर कोरिया देख सकते हैं।
आधुनिक संदर्भ में 38वीं समानान्तर
शीत युद्ध के बाद
1990 के बाद उम्मीद थी कि दोनों कोरिया एक होंगे, लेकिन राजनीतिक मतभेद और परमाणु हथियारों की दौड़ ने स्थिति को और जटिल बना दिया।
हाल की वार्ताएँ
2018 में उत्तर और दक्षिण के नेताओं की ऐतिहासिक मुलाकात DMZ पर हुई।
लेकिन स्थायी शांति अभी भी दूर है।
आज की स्थिति
38वीं समानान्तर आज भी:
सैनिक तनाव का केंद्र है।
राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष का प्रतीक है।
और विभाजित परिवारों के दुख की कहानी कहती है।
कोरियाई युद्ध का विस्तृत विश्लेषण
युद्ध का कारण
वैचारिक संघर्ष: उत्तर में साम्यवाद, दक्षिण में पूंजीवाद।
महाशक्तियों का टकराव: अमेरिका और सोवियत संघ शीत युद्ध में बंध चुके थे।
राष्ट्रीय एकता की चाह: दोनों पक्ष खुद को पूरे कोरिया का वैध प्रतिनिधि मानते थे।
युद्ध की प्रमुख लड़ाइयाँ
(क) पहली सियोल की लड़ाई (जून 1950)
उत्तर कोरियाई सेना ने भारी हथियारों और टैंकों के साथ हमला किया। दक्षिण कोरियाई सेना के पास कोई टैंक नहीं था, जिससे वे हार गए।
(ख) पुसान पेरिमीटर (जुलाई–सितंबर 1950)
दक्षिण कोरिया और अमेरिकी सेना ने कोने में सिमटकर रक्षा की। यह युद्ध का निर्णायक मोड़ बना।
(ग) इंचोन लैंडिंग (सितंबर 1950)
अमेरिकी जनरल डगलस मैकआर्थर ने समुद्री रास्ते से हमला किया। यह बेहद सफल साबित हुआ और सियोल वापस जीत लिया गया।
(घ) चीनी हस्तक्षेप (अक्टूबर 1950)
जब संयुक्त राष्ट्र सेना यालू नदी तक पहुँच गई, तो चीन युद्ध में उतर आया। लाखों सैनिकों ने अचानक हमला कर दिया। इससे युद्ध लंबा खिंच गया।

युद्ध के परिणाम
लाखों लोग मारे गए।
कोरिया पूरी तरह बर्बाद हो गया।
38वीं समानान्तर फिर सीमा बन गई।
विभाजन का मानवीय असर
परिवारों का बँटवारा
लाखों परिवार अचानक दो हिस्सों में बंट गए।
दशकों तक वे एक-दूसरे से नहीं मिल पाए।
आज भी कई बुजुर्ग अपने परिजनों से मिलने की प्रतीक्षा में हैं।
सांस्कृतिक विभाजन
उत्तर में कम्युनिस्ट विचारधारा और सख्त तानाशाही शासन।
दक्षिण में लोकतंत्र, पूंजीवाद और तेज़ी से विकास।
दोनों की संस्कृति, जीवनशैली और सोच में गहरी खाई बन गई।
मानसिक और सामाजिक प्रभाव
युद्ध और विभाजन ने कोरियाई समाज में गहरी पीड़ा छोड़ी।
आज भी 38वीं समानान्तर लोगों की यादों में एक घाव की तरह मौजूद है।
DMZ – युद्ध से शांति तक का सफर
DMZ का सुरक्षा महत्व
दोनों ओर लाखों सैनिक तैनात हैं।
यहाँ आज भी सुरंगें और बम छिपे हैं।
यह सीमा किसी भी समय युद्ध का मैदान बन सकती है।
पर्यावरण का पुनर्जन्म
मानवीय गतिविधियों की कमी से यह क्षेत्र “प्राकृतिक अभयारण्य” बन गया।
यहाँ सारस, एशियाई काला भालू, अमूर तेंदुआ जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
वैज्ञानिक मानते हैं कि DMZ एक “अनजाना पर्यावरणीय चमत्कार” है।
पर्यटन और प्रतीक
दक्षिण कोरिया ने यहाँ पर्यटक स्थल बनाए जैसे Dora Observatory।
यहाँ से लोग दूरबीन से उत्तर कोरिया देख सकते हैं।
यह दुनिया में सबसे अनोखा पर्यटन अनुभव माना जाता है।
शीत युद्ध और कोरियाई तनाव
1953 के बाद
शांति संधि कभी नहीं हुई।
दोनों पक्षों में लगातार टकराव चलता रहा।
1976 की “ट्री ट्रिमिंग घटना”
जब DMZ में एक पेड़ काटने को लेकर अमेरिकी सैनिकों और उत्तर कोरियाई सैनिकों के बीच झड़प हुई। इसमें अमेरिकी सैनिक मारे गए। यह घटना तनाव का बड़ा कारण बनी।
परमाणु हथियारों की दौड़
1990 के बाद उत्तर कोरिया ने परमाणु हथियारों पर काम शुरू किया।
इससे तनाव और बढ़ गया।
अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय आज तक चिंतित हैं।
आधुनिक काल की पहलें
2000 का शिखर सम्मेलन
पहली बार उत्तर और दक्षिण कोरिया के नेताओं ने मुलाकात की।
परिवारों की पुनर्मिलन योजना शुरू हुई।
2018 की ऐतिहासिक मुलाकात
उत्तर कोरिया के किम जोंग-उन और दक्षिण के मून जे-इन DMZ पर मिले।
उन्होंने हाथ मिलाकर “शांति” का संदेश दिया।
परंतु, स्थायी समाधान अब तक नहीं मिला।
आज की स्थिति (2020–2025)
उत्तर कोरिया परमाणु कार्यक्रम पर अड़ा हुआ है।
दक्षिण कोरिया वैश्विक स्तर पर तकनीकी महाशक्ति बन चुका है।
38वीं समानान्तर रेखा अब भी दोनों के बीच “लोहे की दीवार” की तरह खड़ी है।
वैश्विक राजनीति में 38वीं समानान्तर
अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा
अमेरिका दक्षिण कोरिया का सबसे बड़ा सहयोगी है।
चीन उत्तर कोरिया का समर्थन करता है।
इस वजह से 38वीं समानान्तर रेखा सिर्फ कोरियाई नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का विषय बन गई।
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका
UN ने 1950 में हस्तक्षेप किया।
आज भी शांति बनाए रखने के लिए प्रयासरत है।
भारत का दृष्टिकोण
भारत हमेशा से शांति और वार्ता का पक्षधर रहा है।
नेहरू के समय से ही भारत ने कोरिया में मध्यस्थता का प्रयास किया था।
भविष्य की संभावनाएँ
एकीकरण की उम्मीद
कई लोग अब भी मानते हैं कि उत्तर और दक्षिण एक हो सकते हैं।
परंतु राजनीतिक और आर्थिक अंतर बहुत बड़े हैं।
स्थायी तनाव
जब तक परमाणु हथियारों का मुद्दा हल नहीं होता, शांति मुश्किल है।
महाशक्तियों की राजनीति भी इसमें बाधा है।
मानवता की पुकार
विभाजित परिवार अब बूढ़े हो रहे हैं।
वे जीवन में एक बार अपने प्रियजनों से मिलना चाहते हैं।
निष्कर्ष: 38वीं समानान्तर रेखा
38वीं समानान्तर रेखा इतिहास का ऐसा घाव है जो आज भी भरा नहीं।
38वीं समानान्तर रेखा सिर्फ उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा नहीं, बल्कि शीत युद्ध की विरासत है।
38वीं समानान्तर रेखा यह बताती है कि कैसे राजनीति और विचारधारा एक पूरे राष्ट्र को बाँट सकती है।
लेकिन 38वीं समानान्तर रेखा हमें यह भी सिखाती है कि शांति और वार्ता ही स्थायी समाधान हैं।
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