Gomatesvara Statue: श्रवणबेलगोला की प्रसिद्ध और भव्य धरोहर
Introduction
भारत की भूमि हमेशा से आध्यात्मिकता, कला और दर्शन की धरोहर रही है। यहाँ हर युग में ऐसे प्रतीक बने जिन्होंने न केवल धार्मिक इतिहास को बल्कि मानव सभ्यता की आत्मा को भी आकार दिया। कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में स्थित गोमतेश्वर बाहुबली की विशाल प्रतिमा इसी धरोहर का जीवंत उदाहरण है।
यह प्रतिमा केवल पत्थर की मूर्ति नहीं, बल्कि मानव आत्मा की विजय, आंतरिक शांति की खोज और त्याग की अद्भुत कहानी है। यह मूर्ति 1000 से अधिक वर्षों से आस्था, कला और स्थापत्य का संगम बनी हुई है।


जब हम गोमतेश्वर की ओर देखते हैं, तो हमें सिर्फ एक धार्मिक प्रतिमा नहीं दिखती, बल्कि एक ऐसी यात्रा दिखती है जो राजसत्ता से त्याग तक, और शक्ति से शांति तक पहुँचाती है। यही वजह है कि यह प्रतिमा न केवल जैन समुदाय के लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
Who was Gomatesvara?
Birth of Bahubali
गोमतेश्वर का वास्तविक नाम बाहुबली था। वे ऋषभदेव (आदिनाथ), जो जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर थे, के पुत्र थे। बाहुबली अपनी असाधारण शक्ति, सौंदर्य और साहस के लिए जाने जाते थे।
उनका नाम ही संकेत देता है—बाहु (भुजा) और बली (बलशाली)। अर्थात्, जिसकी भुजाओं में अपार शक्ति हो।
The Conflict with Bharat
आदिनाथ के पुत्रों में सबसे बड़े भरत थे, जो आगे चलकर चकवर्ती सम्राट बने। जब भरत ने विश्वविजय कर लिया, तो उन्होंने अपने भाइयों से अपनी सत्ता स्वीकार करने की अपेक्षा की।
लेकिन बाहुबली ने इस अधीनता को स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप दोनों भाइयों के बीच युद्ध छिड़ गया।
The Three Forms of Battle
जैन परंपरा के अनुसार, युद्ध तीन चरणों में हुआ—
1. दृष्टि युद्ध – दोनों ने एक-दूसरे को कठोर दृष्टि से देखा।
2. जल युद्ध – पानी में खड़े होकर शक्ति-परीक्षण किया।
3. मल्ल युद्ध – दोनों ने हाथों से कुश्ती लड़ी।
हर बार बाहुबली ने विजय प्राप्त की।
Realization of True Victory
लेकिन जैसे ही बाहुबली अंतिम विजय प्राप्त करने वाले थे, उनके भीतर आत्मबोध जागा। उन्हें लगा कि संसार की सारी विजय व्यर्थ है यदि मनुष्य स्वयं पर विजय न पा सके।
उन्होंने युद्ध जीतने के बजाय, राज्य, सत्ता और अहंकार को त्याग दिया और तपस्या के मार्ग पर चल पड़े।
The Statue of Gomatesvara
Construction and Patronage
इस प्रतिमा का निर्माण 981 ईस्वी में हुआ।
इसे गंग वंश के मंत्री चामुंडराय ने बनवाया।
प्रतिमा ग्रेनाइट के एक ही विशाल पत्थर को तराशकर बनाई गई है।
Architectural Grandeur
प्रतिमा की ऊँचाई लगभग 57 फीट (17 मीटर) है।
यह विश्व की सबसे ऊँची एकाश्म प्रतिमाओं (monolithic statues) में से एक है।
प्रतिमा निर्वस्त्र है, जो जैन तपस्वियों की सरलता और विरक्ति का प्रतीक है।
Artistic Detailing
बाहुबली को स्थिर खड़े हुए दिखाया गया है, उनके शरीर पर लताओं और बेलों की आकृतियाँ बनी हैं।
यह प्रतीक है कि वे लंबे समय तक ध्यान में खड़े रहे।
चेहरे पर गहन शांति, आधे खुले नेत्र और संतुलित भाव—ये सब हमें बताते हैं कि यह केवल कला नहीं बल्कि आध्यात्मिक अनुभव की मूर्ति है।
Symbolism in Stone
नग्नता – त्याग और सादगी का प्रतीक।
लताएँ – तपस्या और स्थिरता का संकेत।
मुस्कान और शांत चेहरा – आंतरिक शांति का संदेश।
Religious and Spiritual Significance
Jain Philosophy in Stone
जैन धर्म का मूल सिद्धांत है—
- अहिंसा (Non-violence)
- अपरिग्रह (Non-possession)
- आत्मसंयम (Self-restraint)
Gomatesvara इन सिद्धांतों की मूर्त अभिव्यक्ति हैं।

A Universal Message
यह प्रतिमा किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है।
इसका संदेश है कि सच्चा बल बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक होता है।
यह हमें सिखाती है कि अहंकार और इच्छाएँ छोड़कर ही वास्तविक शांति प्राप्त की जा सकती है।
Mahamastakabhisheka Festival
The Ritual
हर 12 वर्षों में आयोजित होने वाला यह महोत्सव गोमतेश्वर की भव्यता को और बढ़ा देता है।
इसमें प्रतिमा को दूध, दही, घी, केसर, नारियल जल, गन्ना रस, चंदन और फूलों से स्नान कराया जाता है।
ऊपर से रंग-बिरंगे पुष्पों की वर्षा होती है।
Spiritual Impact
यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि विश्व स्तर का सांस्कृतिक उत्सव है।
इसमें लाखों लोग भाग लेते हैं।
इस अवसर पर जैन संत प्रवचन करते हैं और लोगों को आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित करते हैं।
Shravanabelagola – The Sacred Land
स्थान: कर्नाटक के हसन जिले में।
बेंगलुरु से दूरी: लगभग 145 किमी।
यह स्थान दो पहाड़ियों से घिरा है – चंद्रगिरि और विंद्यगिरि।
यहाँ 800 से अधिक शिलालेख और मंदिर मौजूद हैं।
Tourism, Heritage and Modern Relevance
आज श्रवणबेलगोला न केवल जैन तीर्थ है बल्कि अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल भी है।
कला इतिहासकार इसे विश्व धरोहर (UNESCO World Heritage) के योग्य मानते हैं।
यहाँ आने वाला हर व्यक्ति केवल एक प्रतिमा नहीं बल्कि एक जीवन-दर्शन लेकर लौटता है।
Lessons from Gomatesvara
1. अहंकार का त्याग – सच्ची विजय दूसरों पर नहीं, स्वयं पर होती है।
2. आत्मसंयम का महत्व – भौतिक सुख क्षणिक हैं, आत्मिक शांति शाश्वत है।
3. सरलता और विरक्ति – जीवन में अनावश्यक वस्तुओं को छोड़ना ही वास्तविक समृद्धि है।
निष्कर्ष
Gomatesvara बाहुबली की प्रतिमा केवल पत्थर पर तराशी गई कलाकृति नहीं है, बल्कि यह मानव आत्मा की महानता और आंतरिक यात्रा का जीवंत प्रतीक है। एक हजार वर्ष से भी अधिक समय से यह प्रतिमा हमें यह सिखा रही है कि—
सच्चा बल बाहुबल में नहीं, आत्मबल में है।
अहंकार और भौतिक विजय क्षणिक हैं, आत्मसंयम और शांति शाश्वत हैं।
त्याग और सरलता ही वास्तविक समृद्धि का मार्ग है।
श्रवणबेलगोला की यह अद्वितीय धरोहर न केवल जैन धर्म के अनुयायियों के लिए पवित्र स्थल है, बल्कि पूरी मानवता को प्रेरणा देने वाली एक वैश्विक आध्यात्मिक धरोहर है। यहाँ की यात्रा हर व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य—आत्मज्ञान और आंतरिक शांति—की ओर अग्रसर करती है।
इसलिए, Gomatesvara सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि आज और आने वाले कल के लिए भी शाश्वत संदेश है।
Related
Discover more from Aajvani
Subscribe to get the latest posts sent to your email.