One Nation One Election: क्या 1 करोड़ EVMs और ₹5300 करोड़ से आएगा लोकतंत्र में नया युग?

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One Nation One Election: क्या यह क्रांतिकारी योजना बदल देगी भारत का चुनावी भविष्य? जानिए पूरी सच्चाई!

भूमिका: लोकतंत्र के अनवरत उत्सव को सरल बनाने की कोशिश

भारतीय लोकतंत्र दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में गिना जाता है। यहां हर वर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव का आयोजन होता है। कभी लोकसभा, तो कभी विधानसभा, कभी उपचुनाव, तो कभी नगरीय निकाय या पंचायत चुनाव

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है — क्या हर साल चुनाव कराना व्यावहारिक है? क्या इससे शासन व्यवस्था पर प्रभाव नहीं पड़ता? क्या लगातार चुनावों से प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता नहीं आती?

इन्हीं सवालों के उत्तर की तलाश में भारत सरकार और नीति-निर्माता “एक राष्ट्र, एक चुनाव” की अवधारणा को गंभीरता से आगे बढ़ा रहे हैं।

क्या है “One Nation One Election”?

“एक राष्ट्र, एक चुनाव” (One Nation, One Election) का अर्थ है कि देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ एक ही समय पर कराए जाएं — ताकि बार-बार चुनावों से होने वाले समय, धन, संसाधन और राजनीतिक ध्यान के बंटवारे को रोका जा सके।

यह अवधारणा कोई नई नहीं है। भारत में 1951 से लेकर 1967 तक इस प्रणाली को अपनाया गया था। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और सरकारों के समय से पहले गिरने के कारण यह प्रणाली धीरे-धीरे टूट गई।

वर्तमान प्रणाली की समस्याएँ

1. लगातार चुनावी चक्र

हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव चलते रहते हैं। इससे न केवल प्रशासन चुनाव ड्यूटी में व्यस्त रहता है, बल्कि नीति निर्माण और विकास कार्य भी बाधित होते हैं।

2. चुनावी खर्च में भारी वृद्धि

हर चुनाव में अरबों रुपए खर्च होते हैं — सरकारी भी और राजनीतिक दलों द्वारा भी। बार-बार चुनावों का मतलब है बार-बार धन की बर्बादी।

3. आदर्श आचार संहिता का प्रभाव

चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है, जिससे नई योजनाएँ या घोषणाएँ रोक दी जाती हैं। यदि हर साल आचार संहिता लगेगी, तो शासन की निरंतरता बाधित होगी।

4. सुरक्षा और प्रशासनिक बोझ

हर चुनाव में लाखों सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों को ड्यूटी में लगाया जाता है — इससे शिक्षा और प्रशासन दोनों प्रभावित होते हैं।

‘One Nation One Election’ लागू करने की संभावनाएं

1. आर्थिक लाभ

चुनाव आयोग के अनुसार यदि 2029 में समानांतर चुनाव कराए जाएं तो इसके लिए करीब ₹5,300 करोड़ की आवश्यकता होगी, लेकिन इसके बाद लंबे समय तक अलग-अलग चुनावों का खर्च बचेगा। यह एक दीर्घकालिक निवेश साबित हो सकता है।

2. समय और संसाधन की बचत

प्रशासन, सुरक्षा बल, शिक्षकों की चुनावी ड्यूटी में कमी आएगी। इससे शासन और शिक्षा प्रणाली पर पड़ने वाला दबाव कम होगा।

3. नीति निर्माण में निरंतरता

सरकारें पूरे कार्यकाल में योजनाओं पर कार्य कर सकेंगी, क्योंकि चुनावी आचार संहिता के बार-बार लागू होने से बचा जा सकेगा।

4. जनता की सहभागिता में सुधार

बार-बार चुनावों से आम जनता में मतदान के प्रति उत्साह में कमी आती है। एक साथ चुनाव से नागरिक ज्यादा संगठित और जागरूक होकर मतदान कर सकते हैं।

One Nation One Election: व्यवहारिक और संवैधानिक चुनौतियाँ

1. संवैधानिक संशोधन की अनिवार्यता

इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174, 356 आदि में संशोधन की आवश्यकता होगी। यह केवल संसद में ही नहीं बल्कि कई राज्यों की विधानसभाओं में भी पारित कराना होगा।

2. राजनीतिक सहमति का अभाव

हर राज्य की राजनीतिक स्थिति अलग है। अनेक क्षेत्रीय दल इसे केंद्र की सत्ता का केंद्रीकरण मानते हैं और इसका विरोध करते हैं।

3. सरकारों का कार्यकाल अचानक खत्म होने पर क्या होगा?

अगर कोई राज्य सरकार बीच में गिर जाती है, तो उस राज्य में क्या राष्ट्रपति शासन लगेगा? या बीच में फिर चुनाव होंगे? यह प्रणाली तब तक अस्थिर रह सकती है जब तक कार्यकालों का सामंजस्य न बन जाए।

4. प्रावधानों का लचीलापन

सभी राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल अलग-अलग समय पर शुरू और समाप्त होते हैं। ऐसे में उन्हें एक साथ लाना संवैधानिक और प्रशासनिक रूप से बड़ी चुनौती है।

One Nation One Election: क्या 1 करोड़ EVMs और ₹5300 करोड़ से आएगा लोकतंत्र में नया युग?
One Nation One Election: क्या 1 करोड़ EVMs और ₹5300 करोड़ से आएगा लोकतंत्र में नया युग?
One Nation One Election तकनीकी आवश्यकता: ईवीएम और वीवीपैट का विस्तार

कितनी मशीनों की ज़रूरत?

2029 के अनुमान के अनुसार, एक साथ चुनाव कराने के लिए लगभग:

46 लाख बैलेट यूनिट्स (BU)

33 लाख कंट्रोल यूनिट्स (CU)

36 लाख वीवीपैट मशीनें

की आवश्यकता होगी। इन मशीनों की कीमत ₹10,000 करोड़ तक पहुँच सकती है।

भंडारण और प्रशिक्षण की ज़रूरत

इतनी बड़ी संख्या में मशीनों के भंडारण के लिए लगभग 800 नए वेयरहाउस चाहिए होंगे। इसके साथ ही लाखों कर्मचारियों को दोहरी ईवीएम सेटअप को हैंडल करने का प्रशिक्षण देना होगा।

One Nation One Election: सुरक्षा और लॉजिस्टिक तैयारियाँ

एक साथ चुनाव कराने के लिए लगभग 7 लाख सुरक्षाकर्मियों की आवश्यकता होगी — जो कि वर्तमान से 50% अधिक है। इसके अलावा, मतदाता सूची, मतदान केंद्रों की स्थापना, कर्मचारियों की नियुक्ति, सामग्री का वितरण, और मतगणना व्यवस्था को पूरी तरह आधुनिक और डिजिटल बनाना होगा।

One Nation One Election: अंतरराष्ट्रीय अनुभव

भारत के अलावा कई देशों में एक साथ चुनावों की प्रणाली है — जैसे अमेरिका, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि। हालांकि उनकी संवैधानिक व्यवस्था और जनसंख्या भारत से अलग है, फिर भी यह दिखाता है कि समानांतर चुनाव प्रशासनिक रूप से संभव हैं — यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो।

‘One Nation One Election’ के पक्ष में तर्क

राष्ट्रीय एकता और जागरूकता को बल मिलेगा।

जनता बार-बार चुनावी रैलियों, प्रचारों और घोषणाओं से परेशान नहीं होगी।

राजनीतिक अस्थिरता और दलबदल की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा।

शासन अधिक स्थिर और प्रभावी होगा।

One Nation One Election: लोकतंत्र में विविधता बनाम एकरूपता

भारत का लोकतंत्र उसकी विविधता पर टिका है। हर राज्य की अपनी सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक चेतना है।

One Nation One Election से एकरूपता का दबाव बनेगा, जिससे क्षेत्रीय मुद्दों की उपेक्षा हो सकती है। इससे छोटे दलों और क्षेत्रीय हितों को नुकसान होगा।

उदाहरण:

छत्तीसगढ़ में कृषि और आदिवासी मुद्दे चुनावी केंद्र में रहते हैं, जबकि गुजरात में व्यापार और औद्योगिक विकास मुख्य एजेंडा रहता है। यदि दोनों राज्यों में एक साथ चुनाव होंगे, तो क्या दोनों की प्राथमिकताएँ बराबरी से स्थान पा सकेंगी?

2. मतदाता मनोविज्ञान पर प्रभाव

चुनावों में मनोविज्ञान का बड़ा योगदान होता है। मतदाता लोकसभा और विधानसभा के लिए अलग-अलग सोचकर वोट डालते हैं। यदि दोनों चुनाव एक साथ होंगे, तो केंद्र की लहर या ब्रांड मोदी/गांधी जैसी छवि का प्रभाव राज्यों के चुनावों पर भी पड़ सकता है। इससे स्थानीय नेतृत्व की पहचान कमजोर हो सकती है।

3. निर्वाचन आयोग की भूमिका और क्षमता

भारत का निर्वाचन आयोग विश्व के सबसे सशक्त संस्थानों में गिना जाता है। लेकिन एक साथ चुनावों से इसकी जिम्मेदारियाँ कई गुना बढ़ जाएंगी:

समान मतदाता सूची तैयार करना

दोहरी ईवीएम प्रणाली को संभालना

एक ही दिन देश भर में निष्पक्ष चुनाव कराना

दो स्तरों की मतगणना — लोकसभा और विधानसभा के लिए

इसके लिए आयोग को न केवल बजट में बढ़ोत्तरी चाहिए, बल्कि ढांचागत, तकनीकी और मानव संसाधनों की भी भारी वृद्धि करनी होगी।

One Nation One Election प्रशासनिक सुझाव: व्यावहारिक मॉडल

1. दो टूकड़ों में चुनाव

देश के सभी राज्यों को दो समूहों में बाँट दिया जाए।

पहले समूह के राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ कराए जाएं।

दूसरे समूह के चुनाव लोकसभा के 2.5 वर्ष बाद कराए जाएं।

धीरे-धीरे इस चक्र को समन्वित किया जा सकता है।

2. विधानसभा कार्यकाल का लचीलापन

संविधान में ऐसा संशोधन किया जा सकता है जिससे राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 6 महीने से 1 साल तक बढ़ाया या घटाया जा सके — ताकि सभी सरकारों का कार्यकाल एक साथ समाप्त हो।

One Nation One Election: जनभावना और लोक संवाद की आवश्यकता

1. आम नागरिकों की राय लेना अनिवार्य है

‘One Nation One Election’ कोई तकनीकी या प्रशासनिक सुधार मात्र नहीं है — यह लोकतंत्र के ढांचे में बड़ा बदलाव है। ऐसे में व्यापक जनमत संग्रह, राज्य स्तर पर चर्चा, स्थानीय पंचायतों तक संवाद, और युवा वर्ग को जागरूक करना जरूरी है।

2. राजनीतिक सहमति कैसे बनें?

राष्ट्रीय स्तर पर सर्वदलीय बैठकें हों

राज्यों के मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्षों की समिति बने

संसद की स्थायी समिति अपनी रिपोर्ट पर खुली चर्चा करे

‘कानून आयोग’ और ‘संविधान समीक्षा आयोग’ से निष्पक्ष राय ली जाए

One Nation One Election विशेष मामला: भारत जैसे संघात्मक ढाँचे में क्या यह सही है?

भारत एक संघीय गणराज्य है — जहाँ केंद्र और राज्य दोनों की स्वतंत्र सत्ता होती है। ‘एक साथ चुनाव’ की अवधारणा संघवाद की आत्मा को चुनौती दे सकती है। संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत “राज्यों का संघ” है, न कि एक एकीकृत राष्ट्र।

संविधान निर्माताओं की दृष्टि

डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य संस्थापकों ने केंद्र और राज्य दोनों को पर्याप्त स्वतंत्रता दी — ताकि स्थानीय लोकतंत्र और राष्ट्रीय हित संतुलित रहें।

यदि ‘एक साथ चुनाव’ की वजह से राज्य सरकारें बार-बार केंद्र की छवि पर निर्भर होने लगें, तो इससे संघीय ढाँचे को ठेस पहुँचेगी।

One Nation One Election आगे की राह: संतुलन बनाना ज़रूरी है

‘One Nation One Election’ की अवधारणा न तो पूर्णतः गलत है, न ही तुरंत लागू करने लायक पूरी तरह तैयार। इसके लिए नीचे दिए गए कदम जरूरी हैं:

1. चरणबद्ध कार्यान्वयन

पहले पंचायत और नगरीय निकायों के चुनाव एक साथ कराए जाएं

फिर राज्य विधानसभाओं को धीरे-धीरे लोकसभा चक्र के साथ लाया जाए

इसके बाद लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ संभव होंगे

2. संवैधानिक संशोधन का सूक्ष्म अध्ययन

किस अनुच्छेद में क्या संशोधन होगा, इसका विस्तृत प्रारूप बने

अनुच्छेद 83: लोकसभा का कार्यकाल

अनुच्छेद 172: विधानसभा का कार्यकाल

अनुच्छेद 85 और 174: सत्र बुलाने और भंग करने की प्रक्रिया

अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन लागू करने की स्थितियाँ

3. तकनीकी बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ बनाना

लाखों ईवीएम और वीवीपैट मशीनों का निर्माण

लॉजिस्टिक्स के लिए वेयरहाउस और डेटा सेंटर

कर्मचारी प्रशिक्षण, डिजिटलीकरण और साइबर सुरक्षा

One Nation One Election: क्या 1 करोड़ EVMs और ₹5300 करोड़ से आएगा लोकतंत्र में नया युग?
One Nation One Election: क्या 1 करोड़ EVMs और ₹5300 करोड़ से आएगा लोकतंत्र में नया युग?

FAQ: One Nation, One Election – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1. ‘One Nation One Election’ का क्या मतलब है?

उत्तर:  इसका मतलब है कि लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ, एक ही समय पर कराए जाएं — ताकि बार-बार चुनाव कराने की जरूरत न पड़े।

Q2. पहले कभी भारत में एक साथ चुनाव हुए हैं?

उत्तर:  हां, 1951 से 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे। लेकिन बाद में सरकारों के जल्दी गिरने और समय से पहले चुनाव होने की वजह से यह व्यवस्था टूट गई।

Q3. क्या एक साथ चुनावों से पैसे की बचत होगी?

उत्तर:  हां, चुनाव आयोग और विधि आयोग दोनों मानते हैं कि इससे हजारों करोड़ रुपये की बचत होगी, क्योंकि बार-बार की लॉजिस्टिक लागत, सुरक्षा बलों की तैनाती और मशीनरी का खर्च बचेगा।

Q4. एक साथ चुनाव के लिए कितनी ईवीएम (EVM) की जरूरत होगी?

उत्तर: करीब 10 लाख से 11 लाख अतिरिक्त EVM और उतने ही VVPAT मशीनों की जरूरत होगी। इससे अनुमानित लागत लगभग ₹5,300 करोड़ आंकी गई है।

Q5. क्या इसके लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा?

उत्तर:  हां। ‘एक साथ चुनाव’ लागू करने के लिए संविधान के कई अनुच्छेदों में संशोधन करना पड़ेगा — जैसे अनुच्छेद 83, 172, 85 और 174।

Q6. क्या इससे राज्यों की स्वायत्तता को नुकसान होगा?

उत्तर:  संभावना है। चूंकि राज्य सरकारों को अपने कार्यकाल घटाना या बढ़ाना पड़ सकता है, इससे भारत के संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है। यह लोकतांत्रिक विविधता को सीमित कर सकता है।

Q7. विपक्षी दल इस पर क्यों आपत्ति कर रहे हैं?

उत्तर:  उनका कहना है कि इससे राष्ट्रीय मुद्दों की लहर में क्षेत्रीय मुद्दे दब सकते हैं, छोटे दलों को नुकसान हो सकता है और केंद्र सरकार को अधिक राजनीतिक लाभ मिल सकता है।

Q8. क्या यह तकनीकी रूप से संभव है?

उत्तर:
तकनीकी रूप से यह मुमकिन है, लेकिन इसके लिए EVM-VVPAT, कर्मचारी, सुरक्षा बल, प्रशिक्षण और डेटा प्रबंधन जैसी कई व्यवस्थाओं को मजबूत करना होगा।

Q9. क्या आम जनता इससे प्रभावित होगी?

उत्तर: जी हां, इससे आम जनता को बार-बार मतदान केंद्र जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि जनता को दोनों चुनावों के बारे में सही जानकारी मिले ताकि वे जागरूक निर्णय ले सकें।

Q10. क्या दुनिया के किसी और देश में ऐसा मॉडल है?

उत्तर:  कुछ देशों जैसे स्वीडन, दक्षिण अफ्रीका और बेल्जियम में केंद्र और राज्य चुनाव एकसाथ होते हैं। लेकिन उनकी शासन-व्यवस्था भारत से अलग होती है।

Q11. क्या इसे तुरंत लागू किया जा सकता है?

उत्तर:  नहीं। इसे लागू करने के लिए समयबद्ध योजना, कानूनी बदलाव, राजनीतिक सहमति और लॉजिस्टिक तैयारी जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करना बेहतर रहेगा।

निष्कर्ष: One Nation, One Election (एक राष्ट्र, एक चुनाव)

“One Nation One Election” एक अत्यंत महत्वाकांक्षी और बहस का विषय बना हुआ प्रस्ताव है, जो भारतीय लोकतंत्र में ऐतिहासिक बदलाव ला सकता है।

One Nation One Election का मुख्य उद्देश्य देशभर में चुनावों की आवृत्ति को कम कर प्रशासनिक खर्च, समय और संसाधनों की बचत करना है।

One Nation One Election से शासन व्यवस्था में स्थिरता आएगी, बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता के कारण विकास कार्यों में रुकावट नहीं आएगी और सरकारी मशीनरी व सुरक्षाबलों पर बोझ कम होगा।

हालांकि, One Nation One Election प्रणाली को लागू करने से पहले कई जमीनी और संवैधानिक चुनौतियों का समाधान करना अनिवार्य होगा।

इसमें राज्यों की स्वायत्तता, विधायिका के कार्यकाल का सामंजस्य, ईवीएम और VVPAT की पर्याप्त उपलब्धता, मतदाता जागरूकता और राजनीतिक दलों की व्यापक सहमति जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं।

यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण संघीय ढांचे वाले देश में सभी राज्यों को एक समय पर चुनाव में शामिल करना सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि संवैधानिक व राजनैतिक चुनौती भी है।

सार रूप में, “One Nation One Election” की संकल्पना भले ही आर्थिक व प्रशासनिक दृष्टिकोण से आकर्षक हो, परंतु इसे लागू करना तभी संभव है जब यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों, संघीय व्यवस्था और जनहित को पूर्ण रूप से ध्यान में रखते हुए समग्र विचार-विमर्श के बाद किया जाए।

भारत के लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि कोई भी बदलाव बहस, सहमति और पारदर्शिता से किया जाए — और “One Nation One Election” का विषय भी इसी सिद्धांत के अंतर्गत आना चाहिए।


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Hello! Welcome To About me My name is Sanjeev Kumar Sanya. I have completed my BCA and MCA degrees in education. My keen interest in technology and the digital world inspired me to start this website, “Aajvani.com.”

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