Seawall along the Uppada coast: क्यों ज़रूरी है ₹323 करोड़ की ये सुरक्षा दीवार?
प्रस्तावना: Uppada तट पर संकट
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ToggleKakinada जिले के Uppada तट पर अत्याधिक तटीय क्षरण की समस्या गम्भीर रूप से सामने आई है। इस संकट को देखते हुए, National Centre for Coastal Research (NCCR), Chennai ने ₹323 करोड़ की लागत से एक दीवार निर्माण – अर्थात seawall along the Uppada coast – का प्रस्ताव रखा है।
यहां हम इस महत्वपूर्ण पहल की पृष्ठभूमि, तकनीकी आयाम, लाभ, आलोचनाएँ तथा आगे की रणनीति पर गहराई से चर्चा करेंगे।
Uppada तट का वर्तमान परिदृश्य और संकट
Uppada तट पर रेगुलर सागर लहरों के प्रभाव में आज ‘shoreline retreat’ की दर दबावपूर्ण रूप से बढ़ी है। यहां का तटीय इलाका मछुआरों की बस्तियों और कृषि भूमि का घर है।
जमीन कटी जा रही है, बाग-बगीचों को क्षति पहुंच रही है और मिथिला व सड़कें प्रभावित हो रही हैं।
सागर लहरों की शक्ति बढ़ना
मौसमी चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता
समुद्री स्तर में वृद्धि
ये सभी मिलकर तटीय क्षरण की समस्या को विकराल रूप दे रहे हैं।
यह समस्या तब और गंभीर हो गई जब अध्ययन में पाया गया कि कुछ क्षेत्रों में तटीय रेखा हर साल 3–5 मीटर तक पीछे हट रही है। इस तुरन्त उपाय की मांग को मजबूत करती है।
NCCR, Chennai की भूमिका
National Centre for Coastal Research (NCCR), Chennai भारत सरकार के MoES (Ministry of Earth Sciences) अंतर्गत स्थित एक प्रमुख संगठन है।
NCCR वैज्ञानिक दृष्टिकोण, डिजिटल मॉडलिंग, धरातलीय आंकड़ों के अध्ययन व समुद्री-भूमि अंतःक्रियाओं पर शोध के लिये जिम्मेदार है।
NCCR ने ‘Uppada coast erosion study’ रिपोर्ट तैयार की, जिसमें पाया गया कि निकट शीघ्र किसी प्रभावी तट सुरक्षा संरचना के बिना, यह तट अगले 10–15 वर्षों में बड़े पैमाने पर तबाह हो सकता है।
इसी शोध के आधार पर उन्होंने seawall along the Uppada coast का विस्तृत तकनीकी अध्ययन प्रस्तावित किया।
Seawall क्या है और उसकी संरचना
Seawall एक कठोर तटीय संरचना होती है, जो लहरों और ज्वारीय लहरों से तट को सुरक्षित रखने के लिए बनाई जाती है।
प्रमुख अवयव:
1. फाउंडेशन – बिछी हुई मजबूत आधार सतह जिसमें RCC या पत्थर डाला जाता है
2. मुख्य दीवार – आमतौर पर कंक्रीट, स्टील अथवा क्र्श्व प्रतिरोधक पत्थरों से निर्मित
3. टॉप वॉकवे – लोगो की आवाजाही के लिये टॉप बेस
4. ड्रेनज सिस्टम – पीछे की तरफ़ पानी निकाले, ताकि दीवार ज़मीन के अंदर दबाव को संभाले रहे
तकनीकी विनिर्देश
National Centre for Coastal Research की रिपोर्ट में दिए गए मुख्य तकनीकी पहलू:
दीवार ऊंचाई: 4–6 मीटर (उच्च ज्वारीय चक्रवात की आशंका के अनुसार)
मूल्यांकन परस्पर शुल्क: आरामदायक स्थिरता के लिए RCC व स्थानीय पत्थरों का मिश्रण
गेबल वॉलेट: दीवार के ऊपर व साइड में समुद्री फ्रंट एनहांसमेंट
सिचाई हैंडलिंग: पीछे के क्षेत्र में ड्रेन निकासी की सुविधा

₹323 करोड़ की योजना – व्यय विन्यास
निर्माण सामग्री (सीमेंट, स्टील, पत्थर): ₹150 करोड़
भूमि, कंसल्टेशन व अध्ययन: ₹50 करोड़
ट्रांसपोर्ट व लेबर: ₹80 करोड़
अन्य (पर्यावरणीय संलग्नता, रखरखाव आरंभिक): ₹43 करोड़
> National Centre for Coastal Research की रिपोर्ट अनुसार, ₹323 करोड को आधार पर चारों मोर्चों पर सुरक्षित और लम्बी अवधि के लिए संरचना की क्षमता विकसित की गई है।
क्रियान्वयन और टाइमलाइन
NCCR द्वारा सिफारिश की गई टाइमलाइन (अभियान आधारित):
मंथन और प्रारंभिक अध्ययन: 6–9 माह
परमिट एवं स्वीकृति प्रक्रिया: 6 माह
निर्माण चरण: 18–24 माह
कुल अनुमानित अवधि: 36–42 माह
निगरानी एवं रख-रखाव आरंभिक 5 वर्षों तक सुनिश्चित वापस आकलन होगा।
Seawall along the Uppada coast: लाभ
1. तटीय कटाव रोक – जमीन सीधे बचती है
2. समुद्री नागरिक सुरक्षा – मछुआरों व ग्रामीणों की सुरक्षा
3. आर्थिक संरक्षण – फसल, इंफ्रास्ट्रक्चर व पर्यटनू जागरूकता
4. लंबी अवधि का समाधान – जब तक पर्यावरणीय संतुलन सुचारू नहीं हो
पर्यावरणीय प्रभाव – निगरानी ज़रूरी
हालांकि seawall प्रभावी है, पर इसके संभावित नकारात्मक पहलू भी हैं:
ऊर्जा प्रतिबिंब – कठोर सीमा किनारों पर लहरों को तेज़ बनाकर प्रतिक्रिया होती है
निकटवर्ती तटों पर असर – अंतःप्रवाह व कटाव
विलुप्त हो सकता जीवन – कुछ तटीय जीव-जन्तु के आवास बाधित
National Centre for Coastal Research ने पर्यावरणीय अभिकल्प (EIA) की सिफारिश की है और दीवार निर्माण के बाद ये मुद्दे सतत निगरानी में रहेंगे।
वैकल्पिक व पूरक रणनीतियाँ
अन्य तटीय संरक्षण उपाय:
ब्रेकवाटर निर्माण – सागर में तट से थोड़ी दूरी पर लहरें तोड़ने वाले अवरोध
वनरोपण / बायो-जीया संक्रमण – सागरीय पौधों व मैंग्रोव वृक्षों का संरक्षण
रेचर ब्लॉक्स – पत्थर संरचनाएं लहरों को अवशोषित करने हेतु
ट्रांसफर कार्यक्रम – प्रभावित ग्रामीणों व मछुआरों को पुनर्वास
इन उपायों को National Centre for Coastal Research ने दीवार के साथ जोड़ने की सलाह दी है ताकि एक मल्टी-प्रोटोकॉल संरक्षण मॉडल नक़्शा तैयार हो सके।
Stakeholder दृष्टिकोण
स्थानीय मछुआरा समुदाय: सुरक्षा की आशा, लेकिन निर्माण अवधि में जीवन प्रभावित हो सकता है
कृषक एवं भूमि मालिक: भूमि का संरक्षण और खेती हेतु स्थिरता
पर्यावरण कार्यकर्ता: दीवार के तटीय जीवन प्रभावों पर सावधानी
सरकार और नीति निर्माताओं: दीवार + प्राकृतिक उपायों की नीति बनाना
National Centre for Coastal Research इन सभी दृष्टिकोणों को अपने उपायों में शामिल कर रहा है।
भू-स्थानिक तकनीक और मॉडलिंग की भूमिका
National Centre for Coastal Research ने seawall along the Uppada coast की रूपरेखा तैयार करने में अत्याधुनिक भू-स्थानिक तकनीकों का प्रयोग किया है:
GIS (Geographic Information System):
तटीय रेखा की दशकों की तुलना
क्षरण के तेज़ क्षेत्रों की पहचान
दीवार की प्रभावी स्थिति का निर्धारण

Remote Sensing (उपग्रह डेटा):
समुद्री लहरों की गति और दिशा
वर्ष भर का वेव एनर्जी इनपुट
मैपिंग ऑफ लो टाइड एंड हाई टाइड जोन
Mathematical Modelling:
लहरों की ऊंचाई और आवृत्ति
seawall निर्माण के बाद wave reflection
संभावित ‘scouring zones’ जहां रेत कटाव तेज हो सकता है
इन सभी मॉडलों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया है कि seawall along the Uppada coast तकनीकी दृष्टि से सबसे उपयुक्त स्थानों पर बने।
निष्कर्ष (Conclusion):
Uppada तट पर हो रहे तेज़ तटीय क्षरण ने एक गंभीर सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक संकट की स्थिति उत्पन्न कर दी है। मछुआरे, किसान, स्थानीय बस्तियाँ, सड़कें, मंदिर, स्कूल और जीवन के बुनियादी ढांचे अब प्रत्यक्ष रूप से खतरे में हैं।
इन सभी के संरक्षण के लिए National Centre for Coastal Research (NCCR), Chennai द्वारा ₹323 करोड़ की लागत से प्रस्तावित seawall along the Uppada coast न केवल एक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है, बल्कि यह एक जीवन रक्षा योजना भी है।
यह परियोजना क्यों आवश्यक है?
तटीय कटाव की गति पिछले कुछ वर्षों में दोगुनी हो चुकी है।
लोगों की आजीविका विशेषकर मछुआरों की – इस तट से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी है।
भविष्य के चक्रवातों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को रोकने के लिए तट की मजबूती जरूरी है।
तकनीकी दृष्टिकोण से:
Seawall along the Uppada coast एक वैज्ञानिक रूप से विश्लेषित और रणनीतिक रूप से डिजाइन की गई संरचना है, जिसमें भू-स्थानिक विश्लेषण, वेव एनर्जी गणना, जल निकासी प्रबंधन और दीर्घकालिक रखरखाव जैसे सभी पहलुओं को शामिल किया गया है।
NCCR की विशेषज्ञता इस बात की गारंटी देती है कि यह दीवार पारंपरिक नहीं बल्कि आधुनिक और लचीली (resilient) होगी।
पर्यावरणीय और सामाजिक संतुलन:
हालांकि किसी भी कृत्रिम तटीय संरचना का कुछ पर्यावरणीय प्रभाव हो सकता है, परन्तु जब उस पर सतत निगरानी और सहायक उपाय (जैसे मैंग्रोव प्लांटेशन, ब्रेकवाटर आदि) लागू किए जाएँ, तो यह संरचना संतुलित विकास का उदाहरण बन सकती है।
इसके साथ-साथ पुनर्वास नीति, सार्वजनिक परामर्श, और सामाजिक भागीदारी इस प्रोजेक्ट को लोगों का प्रोजेक्ट बना सकते हैं।
दीर्घकालिक स्थिरता:
₹323 करोड़ की लागत में न केवल निर्माण, बल्कि अनुसंधान, आकलन, निगरानी और रखरखाव की योजनाएँ भी शामिल हैं।
NCCR ने स्पष्ट किया है कि इस दीवार के साथ-साथ अन्य हरित तटीय संरक्षण विधियाँ भी अपनाई जाएँगी ताकि यह एक एकल समाधान न होकर, मल्टीलेयर प्रोटेक्शन शील्ड का कार्य करे।
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