गीता समोता: CISF की वीरांगना जिसने माउंट एवरेस्ट की चोटी को फतह कर इतिहास रचा
भूमिका
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में महिला सुरक्षा बल की भूमिका दिन-प्रतिदिन अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की सब-इंस्पेक्टर गीता समोता की उपलब्धि न केवल उनके बल के लिए गर्व की बात है, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा स्रोत है।
19 मई 2025 को गीता समोता ने माउंट एवरेस्ट की ऊंची चोटी पर सफलता पूर्वक कदम रखा और साबित कर दिया कि समर्पण, हिम्मत और जुनून से बड़ी से बड़ी चुनौतियाँ भी पार की जा सकती हैं।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
गीता समोता का जन्म राजस्थान के सीकर जिले के एक छोटे से गांव में हुआ। वह एक सामान्य परिवार से आती थीं जहां परंपराओं और सामाजिक नियमों का काफी प्रभाव था।
बचपन से ही गीता में साहस और आत्मनिर्भर बनने की भावना थी, लेकिन उनके रास्ते में कई बाधाएं भी थीं। एक महिला के तौर पर, उन्हें पारंपरिक सोच और सीमित संसाधनों का सामना करना पड़ा।
गीता बचपन से ही खेलकूद में रुचि रखती थीं, खासकर हॉकी में। वह अपने स्कूल और कॉलेज की हॉकी टीम की प्रमुख खिलाड़ी थीं। लेकिन एक गंभीर चोट के कारण उन्हें खेल छोड़ना पड़ा।
यह उनके लिए एक बड़ा झटका था, लेकिन इसी घटना ने उनके भीतर नई ऊर्जा और जुनून को जगाया। उन्होंने सोचा कि जीवन में हार मान लेना समाधान नहीं, बल्कि नए लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना जरूरी है।

CISF में कैरियर की शुरुआत
2011 में गीता ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में सब-इंस्पेक्टर के पद पर सेवा शुरू की। CISF एक ऐसा बल है जो देश के प्रमुख औद्योगिक संस्थानों, हवाई अड्डों और महत्वपूर्ण सरकारी परिसरों की सुरक्षा करता है। गीता ने यहां न केवल अपने कर्तव्यों को बखूबी निभाया, बल्कि अपनी मेहनत और लगन से सबका दिल जीत लिया।
CISF में सेवा करते हुए गीता ने खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाया। इसी दौरान उन्हें पर्वतारोहण की दुनिया से रूबरू होने का मौका मिला।
उन्होंने महसूस किया कि पर्वतारोहण एक ऐसा माध्यम है जो न केवल फिजिकल फिटरनेस बल्कि मानसिक धैर्य, साहस और प्रतिबद्धता की परीक्षा लेता है।
पर्वतारोहण का सफर शुरू
गीता ने अपनी पर्वतारोहण की शुरुआत बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स से की, जहां उन्होंने पर्वतारोहण के मूल सिद्धांत सीखे और कठोर पहाड़ी मौसम में खुद को ढालना सीखा।
यह कोर्स उन्होंने इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) के प्रशिक्षण केंद्र से किया, जो पर्वतारोहण के लिए प्रसिद्ध है। इस दौरान वह अपने बैच की एकमात्र महिला थीं, जिसने सभी बाधाओं को पार कर साहस दिखाया।
उनके समर्पण और मेहनत के कारण CISF ने उन्हें कई उच्च स्तरीय माउंटेनियरिंग प्रशिक्षणों में भेजा। इन प्रशिक्षणों के बाद गीता ने देश की कई ऊंची चोटियों पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की। माउंट सतोपंथ, माउंट लोबुचे जैसी चोटियों को फतह कर उन्होंने साबित कर दिया कि महिलाएं इस क्षेत्र में भी पीछे नहीं हैं।
कठिनाइयों के बावजूद न हार मानना
गीता की सबसे बड़ी परीक्षा 2021 में आई, जब वह पहली बार माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने निकली थीं। दुर्भाग्य से तकनीकी समस्याओं और मौसम की अनुकूलता न होने के कारण यह अभियान रद्द करना पड़ा।
ऐसे समय में कई लोग निराश हो जाते, लेकिन गीता ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने लक्ष्य को और अधिक दृढ़ता से हासिल करने का संकल्प लिया।
उनका मानना था कि पर्वतारोहण केवल शारीरिक ताकत का नाम नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता और धैर्य का नाम है। इस विश्वास के साथ उन्होंने अपनी तैयारियों को और बढ़ाया, अपने शरीर और मन को उस चुनौती के लिए पूरी तरह से तैयार किया।
माउंट एवरेस्ट की सफल चढ़ाई
अंततः 19 मई 2025 को गीता समोता ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा। 8,849 मीटर की ऊंचाई पर पहुँचकर उन्होंने न केवल CISF की पहली महिला अधिकारी के तौर पर इतिहास रचा, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का कारण बन गईं।
उनकी इस सफलता ने कई मायनों में महिलाओं की भूमिका को नया आयाम दिया। कठिन मौसम, ऑक्सीजन की कमी, अत्यधिक ठंड और फिजिकल थकान के बावजूद गीता ने साहस और दृढ़ता के साथ यह उपलब्धि हासिल की।
माउंट एवरेस्ट पर उनका यह कदम सिर्फ एक शिखर को फतह करने जैसा नहीं था, बल्कि यह उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा था, जो जीवन की किसी भी चुनौती का सामना कर सकती हैं।
सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व
गीता समोता की सफलता न केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि यह देश के लिए एक संदेश भी है कि सीमाएं केवल दिमाग में होती हैं, हिम्मत और मेहनत से उन्हें पार किया जा सकता है।
CISF जैसे सुरक्षा बल की महिला अधिकारी का इस ऊंचाई तक पहुंचना युवाओं खासकर लड़कियों के लिए एक प्रेरणा बन गया है।
उनकी कहानी ने समाज में महिलाओं की भूमिका को मजबूत किया है और यह साबित किया है कि महिला सुरक्षा कर्मी शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में किसी से कम नहीं। उनकी उपलब्धि ने महिलाओं को अधिक स्वावलंबी, साहसी और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया है।
गीता समोता का प्रशिक्षण और मानसिक तैयारी
माउंट एवरेस्ट जैसी कठिन चढ़ाई के लिए केवल शारीरिक ताकत ही नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती भी सबसे जरूरी होती है। गीता समोता ने CISF में अपनी ड्यूटी के साथ-साथ पर्वतारोहण की तैयारी को भी प्राथमिकता दी।
उन्होंने न केवल बेसिक और एडवांस्ड माउंटेनियरिंग कोर्स किए, बल्कि योग और मेडिटेशन से अपनी मानसिक स्थिति को मजबूत किया। यह उनकी सफलता का एक बड़ा रहस्य था।
कई बार जब मौसम अनुकूल नहीं था, या ऑक्सीजन की कमी से उनके शरीर में कमजोरी आई, तब भी उन्होंने अपने आप को संभाला और खुद को याद दिलाया कि हार नहीं माननी। इस मानसिक दृढ़ता ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की शक्ति दी।
माउंट एवरेस्ट पर कठिनाइयां और चुनौतियां
19 मई 2025 को, जब गीता समोता एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने निकलीं, तो उन्हें रास्ते में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई इतनी अधिक है कि वहां का वातावरण बेहद शुष्क और ठंडा होता है। ऑक्सीजन की मात्रा भी बहुत कम होती है, जिससे साँस लेना भी कठिन हो जाता है।
रास्ते में कई बार तेज़ हवाएं आईं, और तापमान -40 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया। ऐसे में जमी हुई बर्फ पर चलना या बर्फ के दरारों से बचना एक बड़ी चुनौती थी। साथ ही, चढ़ाई के दौरान शारीरिक थकान और मांसपेशियों में दर्द होना आम बात थी, लेकिन गीता ने हार नहीं मानी।
उनके साथ मौजूद गाइड और टीम के सहयोग से उन्होंने हर कदम सावधानी से बढ़ाया। हर सुबह और शाम की छोटी-छोटी सफलताएं उनके हौसले को और बढ़ाती रहीं। उनका संघर्ष यह दिखाता है कि शारीरिक फिटनेस के साथ-साथ सही योजना और धैर्य भी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
गीता समोता की सफलता का महत्व
गीता समोता की माउंट एवरेस्ट फतह भारत की महिलाओं के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल है। यह साबित करता है कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं।
उनके इस साहसपूर्ण अभियान ने न केवल CISF की छवि को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि यह महिलाओं के लिए भी संदेश लेकर आया कि वे भी किसी भी कठिन काम को पूरा कर सकती हैं।
उनकी इस उपलब्धि ने देश में महिलाओं की सुरक्षा और समानता के मुद्दों पर भी ध्यान केंद्रित किया। साथ ही, युवाओं में भी एक नया जोश और आत्मविश्वास जागृत हुआ है। गीता ने यह दिखा दिया कि अगर हिम्मत और मेहनत हो तो सपने सच हो सकते हैं।
सामाजिक बदलाव में योगदान
गीता समोता की कहानी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने, उनके हौसले बढ़ाने और सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने में मदद करती है। आज भी कई जगह महिलाओं को परंपरागत सोच के कारण आगे बढ़ने में बाधा आती है, लेकिन गीता जैसे उदाहरण से यह दिखता है कि महिलाएं भी सीमाओं को पार कर सकती हैं।
उन्होंने खुद भी ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं के लिए कई प्रेरणादायक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है। वे ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर युवतियों को पढ़ाई और खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उनका मानना है कि शिक्षा और आत्मविश्वास ही समाज में महिलाओं के सशक्तिकरण की नींव है।
भविष्य की योजनाएं
गीता समोता का सपना केवल माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना ही नहीं था। उन्होंने कहा है कि वे आगे भी देश की सेवा करती रहेंगी और पर्वतारोहण के क्षेत्र में और अधिक प्रशिक्षण लेकर और ऊंची चोटियों पर चढ़ाई करेंगी।
उनका लक्ष्य है कि वे युवाओं के लिए पर्वतारोहण के प्रशिक्षण केंद्र खोलें ताकि और अधिक लोग इस कठिन लेकिन रोमांचक खेल को सीख सकें।
उनका यह प्रयास देश में फिटनेस, साहस और मानसिक दृढ़ता को बढ़ावा देगा, साथ ही महिलाओं को शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में मजबूत बनाएगा।
प्रेरणा स्रोत: गीता समोता की कहानी से सीख
गीता समोता की कहानी हमें कई महत्वपूर्ण बातें सिखाती है:
धैर्य और निरंतरता: कठिनाइयों के बावजूद कभी हार न मानना चाहिए।
समर्पण: किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए पूरी मेहनत और समर्पण जरूरी है।
मानसिक मजबूती: शारीरिक ताकत के साथ-साथ मानसिक दृढ़ता भी सफलता की कुंजी है।
लिंगभेद को चुनौती देना: महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरुषों के बराबर या उनसे बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
देशभक्ति: देश की सेवा करते हुए भी अपने सपनों को पूरा किया जा सकता है।
गीता समोता का व्यक्तिगत संघर्ष और प्रेरणा
गीता समोता का जीवन एक संघर्षमय यात्रा रहा है। वे सामान्य परिवार से आती थीं, जहां महिलाओं के लिए सीमित विकल्प होते हैं। बचपन से ही उन्होंने कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन कभी भी अपने लक्ष्य को छोड़ने का मन नहीं बनाया। उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा उनके परिवार और देश की सेवा करने की भावना थी।
CISF में शामिल होने के बाद, उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपनी फिटनेस और मानसिक मजबूती पर भी ध्यान दिया। परिवार की आर्थिक स्थिति ने कभी भी उनकी हिम्मत नहीं तोड़ी। उन्होंने स्वयं को यह संकल्पित किया कि वे न केवल एक बेहतर सुरक्षा अधिकारी बनेंगी, बल्कि महिलाओं के लिए भी एक मिसाल कायम करेंगी।
तकनीकी तैयारी और प्रशिक्षण
माउंट एवरेस्ट जैसी चुनौतीपूर्ण चढ़ाई के लिए गीता समोता ने कई विशेष तकनीकों का अभ्यास किया। उन्होंने ऊंचाई पर श्वास लेने की कठिनाइयों से निपटने के लिए ऑक्सीजन का सही उपयोग करना सीखा। साथ ही, बर्फीली सतहों पर पैरों की पकड़ बढ़ाने के लिए विशेष बूट्स और क्रैम्पों का प्रशिक्षण लिया।
उन्होंने चढ़ाई के दौरान उपयोग होने वाले उपकरणों जैसे कि हिमकलों, रस्सियों और हार्नेस की तकनीक में दक्षता हासिल की। इसके अलावा, उन्होंने तेज़ हवाओं, हिमस्खलन, और बर्फ के दरारों से बचने के लिए सावधानी बरतने की रणनीतियों को भी सीखा।
यह तकनीकी प्रशिक्षण भारत के अग्रणी पर्वतारोहण संस्थानों और अनुभवी गाइडों के निर्देशन में हुआ, जिससे उनका अनुभव और आत्मविश्वास दोनों बढ़े।

टीम का सहयोग और नेतृत्व कौशल
माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई अकेले संभव नहीं होती। गीता समोता ने एक अनुभवी टीम के साथ मिलकर काम किया। टीम में गाइड्स, पोर्टर्स और अन्य पर्वतारोहियों का सहयोग बेहद महत्वपूर्ण था। गीता ने अपने नेतृत्व कौशल का परिचय देते हुए टीम को प्रेरित किया और मुश्किल समय में उनका मनोबल बढ़ाया।
उनकी संवाद क्षमता और संकट प्रबंधन ने टीम को मुश्किल हालात में संयम बनाए रखने में मदद की। उन्होंने हर सदस्य की ताकत और कमजोरी को समझकर काम बांटा, जिससे पूरी टीम ने मिलकर सफलता हासिल की।
माउंट एवरेस्ट की चुनौती: मौसम और शारीरिक जोखिम
एवरेस्ट की ऊंचाई लगभग 8,848 मीटर है, जहां श्वास लेने के लिए वायु में ऑक्सीजन मात्र लगभग एक-तिहाई होती है। इस स्थिति में शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है, जिसे हाइपोक्सिया कहा जाता है। इससे सिरदर्द, मतली, थकान और गंभीर मामलों में मस्तिष्क या फेफड़ों में सूजन तक हो सकती है।
गीता समोता को इस चुनौती से निपटने के लिए अपने शरीर को एडजस्ट करना पड़ा। उन्होंने उच्च ऊंचाई पर प्रशिक्षण के दौरान धीरे-धीरे खुद को अनुकूलित किया। साथ ही, उन्होंने उच्च गुणवत्ता वाले ऑक्सीजन सिलेंडर और अन्य सुरक्षा उपकरणों का भी सही उपयोग किया।
मौसम की बात करें तो यहां तेज़ हवाएं, बर्फीले तूफान और अचानक बदलते तापमान ने कई बार उनकी चढ़ाई को खतरे में डाल दिया। गीता ने ठंड और थकान के बावजूद लगातार अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना जारी रखा।
समाज और देश के लिए संदेश
गीता समोता की यह उपलब्धि सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे देश और खासकर महिलाओं के लिए गर्व का विषय है। यह साबित करता है कि अगर महिला के पास सही अवसर और समर्थन हो, तो वह किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती है।
उनकी कहानी ने देश में महिलाओं की सुरक्षा और समानता की लड़ाई को मजबूती दी है। साथ ही, यह युवाओं में साहस, अनुशासन और धैर्य की भावना को बढ़ावा देती है। गीता ने दिखा दिया कि देश की सेवा करते हुए भी हम अपने व्यक्तिगत सपनों को पूरा कर सकते हैं।
भविष्य की संभावनाएं और नए आयाम
गीता समोता ने न केवल माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई की सफलता हासिल की, बल्कि उन्होंने यह भी कहा है कि वे और भी ऊंची चोटियों को फतह करने की योजना बना रही हैं।
इसके अलावा, वे CISF में पर्वतारोहण प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार करने की भी सोच रही हैं ताकि और अधिक जवान इस चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में दक्ष बन सकें।
वे चाहती हैं कि देश की महिलाएं न केवल शारीरिक सुरक्षा के क्षेत्र में, बल्कि साहसिक खेलों में भी आगे बढ़ें। इसके लिए वे युवाओं के लिए प्रेरणादायक वर्कशॉप, ट्रेनिंग कैंप और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रही हैं।
निष्कर्ष
गीता समोता की माउंट एवरेस्ट पर सफल चढ़ाई न केवल उनकी व्यक्तिगत साहस और समर्पण की कहानी है, बल्कि यह पूरे भारत के लिए गर्व का विषय भी है।
एक केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल की महिला अधिकारी के रूप में, उन्होंने अपने दृढ़ निश्चय, कठिन परिश्रम और उत्कृष्ट प्रशिक्षण से यह साबित कर दिया कि सीमाएँ केवल मानसिक होती हैं।
उनकी यह उपलब्धि न केवल महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रतीक है, बल्कि देश के युवाओं को भी प्रेरित करती है कि वे किसी भी चुनौती को पार कर सकते हैं यदि वे ठान लें।
उनकी यह सफलता हमें यह याद दिलाती है कि सही मेहनत, धैर्य और संयम से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। गीता समोता ने देश की सेवा करते हुए अपनी सीमाओं को पार किया और यह दिखाया कि भारतीय महिला किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल कर सकती है। उनका साहस और नेतृत्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा और महिलाओं के लिए नए आयाम खोलेगा।
इस तरह की उपलब्धियां न केवल व्यक्तिगत सफलता हैं, बल्कि देश के सामरिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। गीता समोता की यह यात्रा हमें सिखाती है कि संघर्ष के बावजूद सपनों को पूरा करना संभव है, और यही सबसे बड़ा संदेश है जो वे हमें छोड़ गई हैं।