जनजातीय गौरव वर्ष: जानिए कैसे भारत कर रहा है आदिवासी नायकों को सम्मानित!
प्रस्तावना: जनजातीय गौरव वर्ष क्या है?
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Toggleजनजातीय गौरव वर्ष भारत सरकार की एक ऐतिहासिक पहल है, जिसका उद्देश्य देश के आदिवासी समुदायों की असाधारण विरासत, बलिदान और सांस्कृतिक विविधता को मुख्यधारा में लाना है। यह कार्यक्रम विशेष रूप से भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आरंभ किया गया है।

आदिवासी समाज की भूमिका भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक अतुलनीय रही है, लेकिन उनके योगदान को उतना स्थान नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। जनजातीय गौरव वर्ष के माध्यम से यह प्रयास किया जा रहा है कि उनकी पहचान, इतिहास और संघर्ष को एक नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।
भगवान बिरसा मुंडा: क्रांति की अग्निशिखा
जब भारत की धरती अंग्रेजों के अत्याचार से कराह रही थी, तब जंगलों और पहाड़ों में भी आज़ादी की आवाज़ गूंज रही थी। उन आवाज़ों में एक सबसे बुलंद नाम था — भगवान बिरसा मुंडा।
जन्म और पृष्ठभूमि
जन्म: 15 नवंबर 1875, उलिहातू गाँव, रांची (झारखंड)
समुदाय: मुंडा जनजाति
शिक्षा: जर्मन मिशन स्कूल, चाईबासा
बचपन से ही बिरसा में असाधारण नेतृत्व क्षमता थी। उन्हें आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा का जुनून विरासत में मिला था।
‘धरती आबा’ की उपाधि
बिरसा मुंडा को उनके अनुयायियों ने “धरती आबा” यानी “धरती के पिता” की उपाधि दी। वे न केवल एक योद्धा थे, बल्कि एक समाज सुधारक, आध्यात्मिक गुरु और पर्यावरण रक्षक भी थे।
बिरसा आंदोलन
जनजातीय गौरव वर्ष की परिकल्पना की जड़ें बिरसा के आंदोलन में देखी जा सकती हैं। उन्होंने ब्रिटिश ज़मींदारी व्यवस्था और मिशनरियों के सांस्कृतिक अतिक्रमण के खिलाफ जोरदार संघर्ष किया।
उनका आंदोलन:
ज़मींदारों के शोषण का विरोध
जंगलों पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकार की बहाली
धार्मिक पुनर्जागरण
शहादत
9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी रहस्यमयी मृत्यु हो गई। वे मात्र 25 वर्ष की उम्र में अमर हो गए। भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में शायद ही कोई इतना कम उम्र में इतना बड़ा प्रभाव छोड़ गया हो।
जनजातीय गौरव वर्ष की घोषणा: एक ऐतिहासिक कदम
जनजातीय गौरव वर्ष की औपचारिक घोषणा 15 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई। यह दिन भगवान बिरसा मुंडा की 146वीं जयंती थी और इसे ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाया गया।
उद्देश्य:
- भगवान बिरसा मुंडा और अन्य आदिवासी नायकों को राष्ट्रीय सम्मान देना
- जनजातीय संस्कृति, कला, संगीत, नृत्य और जीवनशैली को संरक्षित करना
- जनजातीय क्षेत्रों में विकास योजनाओं को प्राथमिकता देना
- युवाओं को प्रेरित करना कि वे अपने इतिहास पर गर्व करें
मंत्रालय की भूमिका
जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने इस वर्ष को विशेष रूप से योजना-समृद्ध और जन-भागीदारी वाला बनाया है। पूरे वर्षभर देशभर में:
सांस्कृतिक उत्सव
शैक्षणिक संगोष्ठियाँ
चित्र प्रदर्शनी
मोबाइल प्रदर्शनी वैन
फिल्में और वृत्तचित्र
स्कूलों में प्रतियोगिताएँ आयोजित की गईं।
जनजातीय गौरव वर्ष को जनआंदोलन बनाने की दिशा में मंत्रालय ने कई राज्यों की स्थानीय भाषाओं और परंपराओं का ध्यान रखते हुए सामग्री और कार्यक्रम विकसित किए।
क्यों ज़रूरी था “जनजातीय गौरव वर्ष”?
1. ऐतिहासिक उपेक्षा की भरपाई
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में आदिवासी आंदोलनों — जैसे संथाल विद्रोह, कोल विद्रोह, भील आंदोलन, आदि को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। यह वर्ष उनके योगदान को व्यापक मंच पर लाने का प्रयास है।
2. संस्कृति और धरोहर का संरक्षण
आदिवासी संस्कृति अत्यंत समृद्ध है — उनके लोकगीत, चित्रकला (जैसे पिथोरा, सॉरा, वारली), त्योहार (सरहुल, कर्मा, माघ पर्व) — ये सब भारत की सांस्कृतिक आत्मा हैं।
जनजातीय गौरव वर्ष इन विरासतों को डिजिटल और सामाजिक माध्यमों के ज़रिए जनमानस तक पहुँचाने का अवसर है।
3. विकास और आत्मनिर्भरता
सरकार इस वर्ष के माध्यम से जनजातीय इलाकों में बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ी योजनाओं को तेज़ी से लागू कर रही है।
राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख गतिविधियाँ
जनजातीय गौरव वर्ष में कई उल्लेखनीय कार्यक्रम आयोजित किए गए:
“आदि महोत्सव”: देशभर में आयोजित आदिवासी कला, हस्तशिल्प और खानपान का उत्सव
डिजिटल संग्रहालयों का निर्माण: जनजातीय इतिहास को डिजिटल रूप में संरक्षित करने की पहल
‘TRIFED’ और ‘वन धन योजना’ का सशक्तीकरण: जिससे आदिवासी उद्यमिता को बढ़ावा मिला
विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम सम्मिलन: आदिवासी नायकों की कहानियाँ अब शिक्षा का हिस्सा बन रही हैं।
जनजातीय गौरव वर्ष: भारत के वीर आदिवासी नायकों को नमन
1. सिद्धू और कान्हू मुर्मू: संथाल विद्रोह के अग्रदूत
सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू ने 1855 में संथाल विद्रोह का नेतृत्व किया, जो ब्रिटिश हुकूमत और ज़मींदारी शोषण के खिलाफ आदिवासियों का सबसे सशक्त विद्रोह माना जाता है। झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के संथाल आदिवासियों ने इस आंदोलन में भारी संख्या में भाग लिया।
प्रमुख योगदान:
ब्रिटिश राज के खिलाफ आदिवासियों की संगठित सैन्य कार्रवाई
भूमि अधिकार और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष
जनजातीय गौरव वर्ष के दौरान संथाल विद्रोह की स्मृति में कई संग्रहालय, चित्र प्रदर्शनी और डॉक्युमेंट्री प्रस्तुत की गईं।
2. रानी दुर्गावती: वीरता की प्रतीक
रानी दुर्गावती, गोंड जनजाति की वीरांगना थीं जिन्होंने 16वीं शताब्दी में मुगलों के खिलाफ युद्ध लड़ा। वे नारी शक्ति और स्वाभिमान की प्रतीक बन चुकी हैं।
विशेषताएँ:
पहली महिला योद्धा जिन्होंने गोंडवाना की सत्ता को संभाला
1564 में अकबर की सेनाओं से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की
जनजातीय गौरव वर्ष के अंतर्गत, उनकी स्मृति में मध्य प्रदेश में कई स्मारक और कार्यक्रम आयोजित हुए।
3. तांत्या भील: आदिवासी रॉबिनहुड
तांत्या भील को मध्य भारत का “आदिवासी रॉबिनहुड” कहा जाता है। उन्होंने अंग्रेज़ों से धन लूटकर गरीबों में बांटा और वनवासियों की रक्षा की।
प्रमुख विशेषताएँ:
अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध शैली
वन संपदाओं और अधिकारों की रक्षा
जनजातीय गौरव वर्ष में उनकी वीरता को याद करते हुए मध्यप्रदेश में विशेष रैलियाँ और ‘तांत्या भील गौरव यात्रा’ निकाली गई।
4. गुंडाधुर: बस्तर का जननायक
गुंडाधुर, बस्तर (छत्तीसगढ़) के आदिवासी नेता थे, जिन्होंने 1910 के बस्तर विद्रोह का नेतृत्व किया।
योगदान:
ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों और शोषण के विरुद्ध संगठित विद्रोह
आदिवासी समाज को राजनीतिक चेतना देना
जनजातीय गौरव वर्ष ने छत्तीसगढ़ में गुंडाधुर को मुख्यधारा में लाने का सराहनीय कार्य किया है।
5. अल्लूरी सीताराम राजू: आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी
आंध्र प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले महान क्रांतिकारी थे अल्लूरी सीताराम राजू।
विशेष योगदान:
मडगोंड और कोया जनजातियों को संगठित कर विद्रोह किया
1924 में शहीद हुए
जनजातीय गौरव वर्ष में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी गई, और उनके जीवन पर वृत्तचित्र व प्रदर्शनी आयोजित की गई।
जनजातीय गौरव वर्ष और सांस्कृतिक जागरण
जनजातीय गौरव वर्ष केवल एक स्मरणोत्सव नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण आंदोलन है।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रमुख झलकियाँ:
- “विरासत उत्सव” — जिसमें लोक नृत्य, संगीत, हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजन प्रस्तुत किए गए
- “जनजातीय रंगमंच” — आदिवासी नाटकों और लोक कथाओं का मंचन
- “चित्रकला उत्सव” — पिथोरा, सॉरा, और वारली जैसे चित्रकला रूपों की प्रदर्शनी
- “वनवासी पुस्तक मेला” — जनजातीय लेखकों की पुस्तकें, कहानियाँ और कविताएँ
इन कार्यक्रमों के माध्यम से जनजातीय गौरव वर्ष ने देश की मुख्यधारा को आदिवासी कला और परंपरा से जोड़ा।

शिक्षा और युवाओं की भूमिका
जनजातीय गौरव वर्ष ने शिक्षा के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी पहल की:
प्रमुख शैक्षणिक प्रयास:
Eklavya Model Residential Schools (EMRS) की संख्या में वृद्धि
जनजातीय नायकों पर आधारित पाठ्यक्रम सामग्री का विकास
राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी में आदिवासी इतिहास की पुस्तकों को जोड़ा गया
“आदिवासी नायक” क्विज प्रतियोगिता: स्कूलों और कॉलेजों में आदिवासी इतिहास पर प्रश्नोत्तरी
इससे नई पीढ़ी को अपनी जनजातीय विरासत पर गर्व करने का अवसर मिला।
महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता
जनजातीय गौरव वर्ष के दौरान सरकार ने महिलाओं की सशक्त भागीदारी पर विशेष ज़ोर दिया:
योजनाएँ:
वन धन योजना के अंतर्गत महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षित किया गया
TRIFED के माध्यम से महिला कारीगरों को बाज़ार से जोड़ा गया
स्थानीय उत्पादों का ब्रांडिंग और ऑनलाइन विपणन
इन पहलों ने “जनजातीय गौरव वर्ष” को महिला आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी बनाया।
जनजातीय गौरव वर्ष और समावेशी विकास
इस वर्ष के माध्यम से देश के वनवासी क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया:
स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार
पेयजल और बिजली पहुंचाना
सड़कों और मोबाइल नेटवर्क विस्तार
कृषि और वन उत्पादों की प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना
इसका लक्ष्य है कि जनजातीय समाज को आत्मनिर्भर और समान अधिकारों वाला भारत का नागरिक बनाया जाए।
FAQs: जनजातीय गौरव वर्ष – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. जनजातीय गौरव वर्ष क्या है?
उत्तर: जनजातीय गौरव वर्ष भारत सरकार की एक पहल है, जिसे भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर 15 नवंबर 2021 को शुरू किया गया। इसका उद्देश्य आदिवासी नायकों के योगदान को सम्मान देना, उनकी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना और जनजातीय समुदायों के विकास को बढ़ावा देना है।
2. भगवान बिरसा मुंडा कौन थे और उनका योगदान क्या था?
उत्तर: भगवान बिरसा मुंडा झारखंड के मुंडा जनजाति के महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने ब्रिटिश ज़मींदारी व्यवस्था और धार्मिक अतिक्रमण के विरुद्ध विद्रोह किया। वे ‘धरती आबा’ के नाम से प्रसिद्ध हैं और जनजातीय गौरव वर्ष उनके बलिदान को सम्मान देने का प्रतीक है।
3. जनजातीय गौरव वर्ष कब मनाया गया?
उत्तर: जनजातीय गौरव वर्ष 15 नवंबर 2021 से शुरू होकर एक वर्ष तक मनाया गया, लेकिन इसका प्रभाव और गतिविधियाँ कई राज्यों में अब भी जारी हैं। यह साल आदिवासी संस्कृति, इतिहास और योगदान को उजागर करने के लिए समर्पित किया गया था।
4. इस पहल का उद्देश्य क्या है?
उत्तर: जनजातीय गौरव वर्ष का उद्देश्य आदिवासी समुदायों के सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक योगदान को पहचान दिलाना है। इसके अंतर्गत विकास योजनाओं को तेज़ी से लागू करना, शिक्षा-संवर्धन, महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण प्रमुख लक्ष्य हैं।
5. जनजातीय गौरव वर्ष के अंतर्गत कौन-कौन से कार्यक्रम आयोजित किए गए?
उत्तर:
आदि महोत्सव (हस्तशिल्प और खाद्य उत्सव)
विरासत चित्र प्रदर्शनी
डिजिटल संग्रहालय
जनजातीय नायकों पर आधारित डॉक्युमेंट्री
स्कूलों व कॉलेजों में क्विज़ और निबंध प्रतियोगिताएँ
6. जनजातीय गौरव वर्ष के प्रमुख नायक कौन-कौन हैं?
उत्तर:
भगवान बिरसा मुंडा
सिद्धू-कान्हू मुर्मू
तांत्या भील
रानी दुर्गावती
गुंडाधुर
अल्लूरी सीताराम राजू
इन सभी महान नायकों के योगदान को जनजातीय गौरव वर्ष के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान दी गई।
7. इस वर्ष के दौरान कौन-सी प्रमुख योजनाएँ चलाई गईं?
उत्तर:
वन धन योजना: आदिवासी उत्पादों को बाज़ार से जोड़ना
TRIFED: आदिवासी कारीगरों को प्रशिक्षण और विपणन सहायता
एकलव्य मॉडल स्कूलों की स्थापना
महिला स्वयं सहायता समूहों को सहयोग
डिजिटल शिक्षा और स्वास्थ्य अभियान
8. जनजातीय गौरव वर्ष में TRIFED की क्या भूमिका रही?
उत्तर: TRIFED (Tribal Cooperative Marketing Development Federation of India) ने जनजातीय गौरव वर्ष में आदिवासी उत्पादों की ब्रांडिंग, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिक्री, और महिला कारीगरों को उद्यमिता प्रशिक्षण प्रदान किया।
9. क्या जनजातीय गौरव वर्ष का कोई स्थायी प्रभाव होगा?
उत्तर: हाँ, यह केवल एक वर्ष तक सीमित पहल नहीं है। इसकी विरासत के रूप में सरकार कई योजनाओं को स्थायी रूप से लागू कर रही है — जैसे डिजिटल संग्रहालय, आदिवासी पाठ्यक्रम, आर्थिक आत्मनिर्भरता योजना, आदि।
10. जनजातीय गौरव वर्ष से युवाओं को कैसे जोड़ा गया?
उत्तर: स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में प्रतियोगिताएँ, निबंध लेखन, जनजातीय नायकों की कहानियों का प्रचार-प्रसार, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री और शिक्षण मॉड्यूल तैयार कर युवाओं को इस अभियान से जोड़ा गया।
11. जनजातीय गौरव वर्ष का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
उत्तर: हर भारतीय को अपने देश के जनजातीय इतिहास, उनके संघर्ष, संस्कृति और योगदान पर गर्व होना चाहिए। जनजातीय गौरव वर्ष ने हमें याद दिलाया है कि आदिवासी समाज भारत की आत्मा है।
निष्कर्ष: जनजातीय गौरव वर्ष – भारत की आत्मा को नया सम्मान
जनजातीय गौरव वर्ष केवल एक कैलेंडर वर्ष का नाम नहीं है, बल्कि यह भारत के उस मौलिक हिस्से को श्रद्धांजलि है, जिसे लंबे समय तक इतिहास की मुख्यधारा से वंचित रखा गया था। यह वर्ष एक राष्ट्रीय पुनर्स्मरण, संवेदनशीलता, और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है।
इस ऐतिहासिक पहल ने हमें भगवान बिरसा मुंडा जैसे महान योद्धाओं के साथ-साथ सिद्धू-कान्हू, तांत्या भील, रानी दुर्गावती, गुंडाधुर और सीताराम राजू जैसे सैकड़ों जनजातीय नायकों के अद्वितीय बलिदान को जानने और समझने का अवसर दिया।
जनजातीय गौरव वर्ष ने हमें क्या सिखाया?
- गौरवपूर्ण इतिहास को जानना हमारा अधिकार और कर्तव्य दोनों है
- आदिवासी समाज केवल वनवासी नहीं, बल्कि संस्कृति के संवाहक हैं
- हर भारतीय को इस सांस्कृतिक विविधता पर गर्व होना चाहिए
- विकास तब तक अधूरा है जब तक उसमें आदिवासी समाज शामिल नहीं होता
एक स्थायी विरासत की ओर
जनजातीय गौरव वर्ष ने एक स्थायी सोच को जन्म दिया है — यह सोच कि भारत की विविधता ही उसकी शक्ति है। आज जब हम “न्यू इंडिया” की बात करते हैं, तो उसमें आदिवासी समाज की भागीदारी और नेतृत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
सरकार की योजनाएँ — जैसे वन धन योजना, TRIFED, एकलव्य स्कूल, डिजिटल संग्रहालय, और आदिवासी नायकों पर आधारित पाठ्यक्रम — यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि जनजातीय समाज का भविष्य उज्ज्वल और सशक्त हो।
सम्मान की संस्कृति बनाएं
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि:
आदिवासी समाज के प्रति सम्मान को अपनी संस्कृति बनाएं
उनके साथ समावेशी विकास की दिशा में सहयोग करें
उनके इतिहास को आगे की पीढ़ियों तक पहुँचाएं
जनजातीय गौरव वर्ष एक शुरुआत है — पहचान, सम्मान और समावेश की ओर।
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