सरदार वल्लभभाई पटेल और भारत का एकीकरण: जानिए कैसे 562 रियासतें बनीं एक भारत
परिचय – लौह पुरुष और राष्ट्र की एकता के शिल्पकार
भारत की स्वतंत्रता की सुबह के साथ ही एक बड़ी चुनौती खड़ी थी — 562 रियासतों को एक साथ जोड़कर एक एकीकृत भारत का निर्माण करना।
ब्रिटिश शासन के अंत के बाद ये रियासतें स्वतंत्रता, भारत में विलय या पाकिस्तान में शामिल होने के विकल्पों के सामने थीं।
ऐसे कठिन समय में सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, रणनीतिक सोच और अटूट देशभक्ति से इस असंभव कार्य को संभव किया।
उनके इसी असाधारण योगदान के कारण उन्हें “भारत का लौह पुरुष (Iron Man of India)” कहा गया।
पृष्ठभूमि – भारतीय रियासतों की स्थिति स्वतंत्रता से पहले
ब्रिटिश शासन के समय की स्थिति
ब्रिटिश भारत दो भागों में बँटा था —
1. ब्रिटिश प्रांत (जो सीधे ब्रिटिश सरकार के अधीन थे)
2. देशी रियासतें (Princely States) — जहाँ स्थानीय राजा-नवाब शासक थे, लेकिन ब्रिटिश ‘सर्वोच्च सत्ता’ को मान्यता देते थे।
इन रियासतों की संख्या लगभग 562 थी।
कुछ रियासतें बहुत बड़ी थीं जैसे — हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़, मैसूर आदि।
कुछ बहुत छोटी, जिनका क्षेत्रफल कुछ ही वर्ग किलोमीटर था।
स्वतंत्रता के बाद की चुनौती
1947 में जब ब्रिटिश भारत दो हिस्सों — भारत और पाकिस्तान — में विभाजित हुआ,
तब ब्रिटिश सरकार ने इन रियासतों को यह अधिकार दिया कि वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हों या स्वतंत्र रहें।
यही भारत के लिए सबसे बड़ा संकट बना —
अगर हर रियासत स्वतंत्र रहती, तो भारत सैकड़ों छोटे-छोटे देशों में बँट जाता।
सरदार वल्लभभाई पटेल की नियुक्ति और जिम्मेदारी
स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल को देश का पहला गृह मंत्री (Home Minister) और उपप्रधानमंत्री (Deputy Prime Minister) बनाया गया।
उन्होंने अपने सहयोगी वी. पी. मेनन (V. P. Menon) के साथ मिलकर “राज्य विभाग (States Department)” का गठन किया।
इस विभाग का मुख्य उद्देश्य था —
सभी रियासतों को भारतीय संघ (Indian Union) में मिलाना और एक एकीकृत भारत बनाना।

पटेल की रणनीति – समा, दाम, दंड और भेद
सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस मिशन के लिए चार-स्तरीय नीति अपनाई, जो भारतीय कूटनीति का उत्कृष्ट उदाहरण बन गई:
समा – संवाद और समझाइश
उन्होंने रियासतों को विश्वास दिलाया कि भारत में शामिल होना उनके हित में है।
उन्होंने कहा —
> “राष्ट्र की एकता में ही तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है।”
दाम – लाभ का प्रस्ताव
रियासतों को ‘Privy Purse’ (वार्षिक भत्ता) और पद-सम्मान देने का वादा किया गया।
इससे शासक-वर्ग को आर्थिक सुरक्षा मिली और वे विलय के लिए राजी हुए।
दंड – कठोरता और कार्रवाई
जहां रियासतें ज़िद पर अड़ी रहीं, वहां पटेल ने सैन्य कदम उठाने में हिचक नहीं दिखाई।
जूनागढ़ और हैदराबाद इसके उदाहरण हैं।
भेद – रणनीतिक विभाजन
उन्होंने उन रियासतों को आपस में जोड़कर, धीरे-धीरे बड़े संघ बनाए।
उदाहरण — सौराष्ट्र संघ, राजस्थान संघ, मध्य भारत संघ आदि।
प्रमुख रियासतों का विलय – ऐतिहासिक घटनाएँ
1. जूनागढ़ (Junagadh)
मुस्लिम नवाब द्वारा शासित राज्य, परंतु अधिकांश जनसंख्या हिंदू थी।
नवाब ने पाकिस्तान में शामिल होने की घोषणा की।
सरदार पटेल ने जनमत संग्रह कराया जिसमें 99% जनता ने भारत में विलय का समर्थन किया।
परिणाम: जूनागढ़ भारत में शामिल हुआ।
2. हैदराबाद (Hyderabad)
निज़ाम उस्मान अली खान स्वतंत्र रहना चाहता था।
निज़ाम की सेना और ‘रज़ाकार’ संगठन ने हिंसा फैलाई।
सितंबर 1948 में पटेल ने “ऑपरेशन पोलो” चलाया।
पाँच दिन के भीतर हैदराबाद भारतीय सेना के नियंत्रण में आ गया।
परिणाम: हैदराबाद भारत का अभिन्न अंग बन गया।
3. कश्मीर (Jammu & Kashmir)
महाराजा हरि सिंह प्रारंभ में स्वतंत्र रहना चाहते थे।
पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले के बाद उन्होंने भारत से सहायता मांगी।
26 अक्टूबर 1947 को उन्होंने Instrument of Accession पर हस्ताक्षर किए।
परिणाम: जम्मू-कश्मीर भारत में शामिल हुआ।
4. त्रावणकोर, कोचीन और राजस्थान
इन रियासतों ने पटेल की समझाइश से शांतिपूर्ण तरीके से भारत में विलय किया।
1949 में त्रावणकोर-कोचीन का संयुक्त राज्य बना।
राजस्थान में 22 रियासतों को मिलाकर एक बड़ा राज्य गठित हुआ।
विलय की कानूनी प्रक्रिया – Instrument of Accession
सरदार वल्लभभाई पटेल ने वी.पी. मेनन की मदद से एक दस्तावेज तैयार कराया —
Instrument of Accession (विलय-पत्र)
इस पर हस्ताक्षर करने के बाद रियासत भारत का हिस्सा बन जाती थी,
और केंद्र सरकार को तीन विषयों पर अधिकार मिलते थे:
1. रक्षा
2. विदेश नीति
3. संचार
इस विधिक दस्तावेज ने विलय की प्रक्रिया को संवैधानिक और शांतिपूर्ण बना दिया।
चुनौतियाँ जिनसे पटेल को जूझना पड़ा
1. कुछ राजा अपनी सत्ता खोने को तैयार नहीं थे।
2. पाकिस्तान के दबाव से कुछ रियासतें प्रभावित थीं।
3. सांप्रदायिक हिंसा और जनता की असंतुष्टि का खतरा था।
4. सीमित समय और प्रशासनिक संसाधन।
फिर भी, पटेल ने कूटनीति और दृढ़ता से सभी बाधाओं को पार किया।
महज एक वर्ष में उन्होंने लगभग सभी रियासतों को भारत में मिला लिया।

भारत का पुनर्गठन – संघीय एकता की दिशा में
1950 तक सभी रियासतें भारतीय संघ का हिस्सा बन चुकी थीं।
बाद में राज्य पुनर्गठन आयोग (1956) के माध्यम से भाषाई और प्रशासनिक दृष्टि से सीमाएँ तय की गईं।
सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों ने भारत को एक सशक्त, स्थिर और एकीकृत राष्ट्र बनने की नींव दी।
सरदार वल्लभभाई पटेल की नीति के प्रभाव और परिणाम
राजनीतिक एकता
भारत को एकता और अखंडता मिली।
यदि यह कार्य असफल होता, तो आज भारत सैकड़ों टुकड़ों में बँटा होता।
प्रशासनिक स्थिरता
विभिन्न रियासतों की प्रणालियों को एकीकृत कर एक समान शासन-व्यवस्था स्थापित हुई।
राष्ट्रीय सुरक्षा
पड़ोसी देशों के हस्तक्षेप को रोककर पटेल ने भारत की सुरक्षा सुनिश्चित की।
लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना
रियासतों की निरंकुश शासन व्यवस्था समाप्त कर लोकतांत्रिक प्रणाली लागू हुई।
आधुनिक भारत में पटेल की विरासत
31 अक्टूबर को हर वर्ष राष्ट्रीय एकता दिवस (National Unity Day) के रूप में मनाया जाता है।
गुजरात में विश्व की सबसे ऊँची मूर्ति — Statue of Unity (182 मीटर) — उनकी स्मृति में बनाई गई है।
उनके योगदान से प्रेरित होकर भारत में आज भी “एकता में शक्ति” का भाव जीवित है।
आलोचनाएँ और विवाद
कुछ आलोचकों का मत है कि विलय प्रक्रिया में शासकों को पर्याप्त स्वायत्तता नहीं मिली।
जम्मू-कश्मीर का विलय आज भी राजनीतिक बहस का विषय है।
कुछ विद्वानों ने कहा कि यह विलय “लोकमत” की अपेक्षा “राजनीतिक मजबूरी” से हुआ।
फिर भी, यह सर्वमान्य है कि यदि पटेल का दृढ़ नेतृत्व न होता,
तो भारत का भूगोल आज बिल्कुल अलग होता।
निष्कर्ष – भारत की एकता के निर्माता सरदार वल्लभभाई पटेल
स्वतंत्र भारत के इतिहास में सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका सबसे निर्णायक और ऐतिहासिक रही।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने न केवल राजनीतिक दृष्टि से बिखरे हुए भारत को एक सूत्र में पिरोया, बल्कि एक ऐसे एकीकृत, सशक्त और स्थिर राष्ट्र की नींव रखी जो आज विश्व के सामने गर्व से खड़ा है।
ब्रिटिश शासन के अंत के बाद जब देश के सामने 562 रियासतों के विलय की कठिन चुनौती थी, तब पटेल ने अपनी कूटनीति, दृढ़ इच्छाशक्ति और व्यावहारिक सोच से इस असंभव कार्य को संभव बना दिया।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने “समा, दाम, दंड, भेद” की नीति का अत्यंत संतुलित प्रयोग किया — जहां संवाद और समझाइश से काम चला, वहां उन्होंने संयम रखा; और जहां राष्ट्र की अखंडता पर खतरा था, वहां कठोर निर्णय लेने से भी पीछे नहीं हटे।
उनकी रणनीति ने भारत को राजनीतिक अस्थिरता और विभाजन के संकट से बचाया। जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर जैसी रियासतों के विलय में उनकी निर्णायक भूमिका ने भारत को एकता का स्वरूप दिया।
आज जब भारत एक संघीय गणराज्य (Federal Republic) के रूप में कार्य कर रहा है, तो उसकी बुनियाद पटेल की दूरदर्शिता और नेतृत्व में ही निहित है।
उनकी सोच थी —
> “अगर भारत को महान बनाना है, तो हमें पहले एक रहना होगा।”
उनके योगदान के सम्मान में भारत हर वर्ष 31 अक्टूबर को “राष्ट्रीय एकता दिवस” मनाता है और गुजरात में स्थित “Statue of Unity” उनकी अमर विरासत का प्रतीक है।
इसलिए कहा जाता है —
> “अगर गांधी ने भारत को स्वतंत्र कराया, तो पटेल ने भारत को एकजुट किया।”
सरदार वल्लभभाई पटेल का कार्य केवल इतिहास का अध्याय नहीं,
बल्कि एक जीवंत प्रेरणा है जो हर भारतीय को राष्ट्र की एकता, निष्ठा और दृढ़ संकल्प का संदेश देती है।
