Nuclear Plant in Rajasthan: Forest Panel की हरी झंडी से खुल सकता है ऊर्जा विकास का नया अध्याय!
प्रस्तावना: भारत की ऊर्जा क्रांति की ओर एक और कदम
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Toggleभारत आज अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नए और सशक्त विकल्पों की तलाश में है। जलवायु परिवर्तन, जीवाश्म ईंधनों की सीमितता और ऊर्जा सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों के बीच परमाणु ऊर्जा एक स्थायी समाधान के रूप में उभर रही है।
इसी दिशा में राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में माही-बांसवाड़ा Nuclear Plant परियोजना प्रस्तावित की गई है, जिसे केंद्र सरकार की मंज़ूरी के बाद अब वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee – FAC) के विचाराधीन रखा गया है।
यह परियोजना न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश की ऊर्जा रूपरेखा को बदल सकती है।
परियोजना का परिचय: माही-बांसवाड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र
परियोजना का नाम: माही-बांसवाड़ा Nuclear Plant परियोजना
स्थान: सजवानिया, बांसवाड़ा जिला, राजस्थान
क्षमता: कुल 2,800 मेगावाट (4 रिएक्टर × 700 मेगावाट)
संयुक्त उद्यम: NPCIL (51%) और NTPC (49%) की संयुक्त कंपनी – अनुषक्ति विद्युत निगम लिमिटेड (ASHVINI)
परियोजना क्षेत्र: लगभग 1,366 एकड़ भूमि, जिसमें 553 हेक्टेयर वन भूमि शामिल है
शीतलन स्रोत: माही बजाज सागर बांध (माही नदी पर)
यह परियोजना भारत में IPHWR-700 तकनीक पर आधारित चौथी परियोजना है। इससे पहले यह तकनीक गुजरात के काकरापार और राजस्थान के रावतभाटा में अपनाई गई है।
तकनीकी विशेषताएं: भारतीय स्वदेशी रिएक्टर का उपयोग
यह संयंत्र भारतीय तकनीक से निर्मित IPHWR-700 रिएक्टर पर आधारित है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
प्रेसराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) तकनीक
उच्च तापीय दक्षता
अत्यधिक सुरक्षित संचालन तंत्र
ऑनसाइट शीतलन प्रणाली
माही बजाज सागर से शीतलन जल की आपूर्ति
इस संयंत्र का डिज़ाइन भारतीय पर्यावरण और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार तैयार किया गया है, जिससे इसकी कार्यक्षमता और दीर्घकालिक उपयोगिता में बढ़ोतरी होगी।
वन भूमि की स्वीकृति प्रक्रिया और विवाद
परियोजना के लिए प्रस्तावित 553 हेक्टेयर वन भूमि को उपयोग में लाने के लिए भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत गठित Forest Advisory Committee (FAC) से अनुमति की आवश्यकता है।
FAC ने इस परियोजना को मई 2025 में समीक्षा के लिए शामिल किया है। अब समिति इस बात पर विचार कर रही है कि क्या परियोजना को वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत अनुमति दी जानी चाहिए।
वन भूमि स्वीकृति के मुख्य बिंदु:
मुआवजा राशि: ₹415 करोड़ (Compensatory Afforestation & NPV)
क्षेत्र प्रभावित: सजवानिया, बाड़ी, खारिया देव, रेल, आदि गांव
प्राकृतिक संसाधनों पर प्रभाव: जैव विविधता, जलीय जीवन, वन्यजीव
स्थानीय समुदायों की स्थिति और विरोध
हालांकि सरकार इस परियोजना को ऊर्जा क्रांति के रूप में देख रही है, लेकिन स्थानीय जनजातीय समुदायों में गहरी असंतुष्टि है।
मुख्य चिंताएं:
पुनर्वास में पारदर्शिता की कमी
मुआवजे का वितरण अस्पष्ट
रोजगार के अवसरों की अनिश्चितता
पर्यावरणीय जोखिम से आजीविका को खतरा
अप्रैल 2025 में सैकड़ों ग्रामीणों ने बांसवाड़ा कलेक्टर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। उन्होंने मांग की कि उन्हें उचित मुआवजा, पुनर्वास की ठोस योजना और परियोजना पर जनसुनवाई का अधिकार मिले।
पर्यावरणीय प्रभाव: लाभ और जोखिम दोनों
संभावित लाभ:
कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी
कोयले पर निर्भरता में कमी
हरित ऊर्जा लक्ष्य की पूर्ति
संभावित जोखिम:
स्थानीय जल स्रोतों पर दबाव
थर्मल प्रदूषण
वन्यजीवों की प्रवास प्रणाली में बाधा
परमाणु कचरे का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण
EIA (पर्यावरणीय प्रभाव आकलन) रिपोर्ट में सलाह दी गई है कि परियोजना की साइट पर विस्तृत पर्यावरणीय निगरानी प्रणाली स्थापित की जाए।

सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव
सकारात्मक प्रभाव:
स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार
इन्फ्रास्ट्रक्चर में विकास – सड़क, बिजली, स्वास्थ्य केंद्र
राज्य के राजस्व में वृद्धि
नकारात्मक प्रभाव:
परंपरागत जीवनशैली पर असर
भूमि अधिग्रहण से विस्थापन
संस्कृतिक धरोहर पर खतरा
राजस्थान की भील और मीणा जनजातियों का इन क्षेत्रों में गहरा संबंध है, इसलिए किसी भी परियोजना को स्थानीय संस्कृति के सम्मान के साथ आगे बढ़ाना आवश्यक है।
सरकार और कंपनियों की तैयारी
NPCIL और NTPC द्वारा स्थापित ASHVINI कंपनी ने सभी तकनीकी अध्ययन, DPR, भूमि सर्वे और पूर्व-साइट निर्माण गतिविधियां लगभग पूरी कर ली हैं।
सरकार की योजना है कि 2026 के अंत तक निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाए और पहला रिएक्टर 2032 तक चालू हो जाए।
विशेषज्ञों की राय
Nuclear Plant विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपने बढ़ते ऊर्जा भूख को शांत करने के लिए परमाणु ऊर्जा में निवेश करना ही होगा। लेकिन यह तभी संभव है जब:
पर्यावरणीय संतुलन बरकरार रखा जाए
पारदर्शी पुनर्वास नीति लागू हो
स्थानीय समुदायों को सहभागी बनाया जाए
भारत की Nuclear Plant नीति में इस परियोजना का स्थान
भारत का लक्ष्य है कि वह 2047 तक 100 गीगावाट Nuclear Plant क्षमता प्राप्त करे। माही-बांसवाड़ा परियोजना इस लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
इस परियोजना के चालू होने से भारत की कुल परमाणु उत्पादन क्षमता लगभग 11% बढ़ जाएगी, जिससे यह देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा योगदान देगा।
अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भारत की परमाणु नीति
भारत ने सिविल न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूती दी है। अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान जैसे देशों के साथ भारत की असैनिक परमाणु समझौते हुए हैं, जिसके तहत:
परमाणु ईंधन (यूरेनियम) की आपूर्ति सुनिश्चित होती है
तकनीकी सहयोग और रिएक्टर डिजाइन में विदेशी भागीदारी संभव होती है
IAEA (International Atomic Energy Agency) के दिशा-निर्देशों का पालन होता है
माही-बांसवाड़ा परियोजना पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है, जिससे भारत अपनी तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन करता है और वैश्विक मंच पर एक सशक्त संकेत देता है कि हम अब आयात पर निर्भर नहीं हैं।
परियोजना में संभावित चुनौतियाँ
1. वन्यजीवों का विस्थापन
बांसवाड़ा क्षेत्र वन्यजीवों से समृद्ध है – जैसे चीतल, सियार, तेंदुआ, पक्षी प्रजातियाँ। परियोजना निर्माण के कारण इनके प्राकृतिक आवास पर असर पड़ सकता है।
2. पानी का अत्यधिक उपयोग
परमाणु संयंत्रों में शीतलन (cooling) के लिए लाखों लीटर पानी की आवश्यकता होती है। माही बजाज सागर बांध से यह पानी लिया जाएगा, जिससे स्थानीय कृषि और पीने के पानी की आपूर्ति पर असर हो सकता है।
3. रेडियोधर्मी कचरे का प्रबंधन
परमाणु संयंत्रों से निकलने वाला रेडियोधर्मी अपशिष्ट बेहद संवेदनशील होता है। यदि इसे वैज्ञानिक तरीके से संग्रहित और निष्पादित न किया जाए तो यह हजारों वर्षों तक पर्यावरण के लिए खतरनाक हो सकता है।
जनजागरूकता और पारदर्शिता की आवश्यकता
Nuclear Plant परियोजनाएं अक्सर आम जनता के लिए जटिल विषय होती हैं। इसलिए सरकार और कंपनियों को यह ज़रूरी है कि:
जनजागरूकता अभियान चलाए जाएं
स्थानीय भाषा में जानकारी प्रदान की जाए
जनसुनवाई प्रक्रिया ईमानदारी से हो
मीडिया और सिविल सोसाइटी को निगरानी में शामिल किया जाए
यदि लोग समझेंगे कि यह Nuclear Plant परियोजना उनके लिए क्या लेकर आ रही है — लाभ, हानि, सुरक्षा — तभी सहमति और सहयोग मिलेगा।
राजस्थान में परमाणु ऊर्जा का भविष्य
राजस्थान पहले से ही परमाणु ऊर्जा में अग्रणी है:
रावतभाटा परमाणु संयंत्र, कोटा – यहां पहले से 6 रिएक्टर कार्यरत हैं
यूरेनियम के भंडार – खासकर सीकर, झुंझुनू, नागौर में
माही-बांसवाड़ा परियोजना राजस्थान को एक प्रमुख न्यूक्लियर हब बना सकती है, जिससे:
निवेश बढ़ेगा
तकनीकी मानव संसाधन विकसित होंगे
ऊर्जा क्षेत्र में राज्य की भागीदारी बढ़ेगी
स्थानीय समाज पर सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
1. आजीविका पर प्रभाव
Nuclear Plant परियोजना क्षेत्र के कई ग्रामीण परिवार खेती, वनों पर निर्भर शिकार और पशुपालन पर जीवित हैं। भूमि अधिग्रहण से उन्हें विस्थापन का संकट झेलना पड़ेगा। इसके साथ ही:
उन्हें शहरों की ओर पलायन करना पड़ सकता है
पारंपरिक जीवनशैली खत्म हो सकती है
सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ सकती है
2. रोजगार की संभावनाएँ
हालांकि, निर्माण और संचालन के दौरान हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सकता है:
इंजीनियर, टेक्नीशियन, ऑपरेटर
निर्माण श्रमिक
लोकल मार्केट और सेवाओं की माँग में वृद्धि
यदि स्किल डेवलपमेंट और लोकल भर्ती को प्राथमिकता मिले, तो यह प्रोजेक्ट सामाजिक विकास का जरिया बन सकता है।

विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की राय
डॉ. अरुणाभा घोष (CEEW)
“भारत को न्यूक्लियर एनर्जी की ज़रूरत है, लेकिन हमें इस प्रक्रिया में सामाजिक और पारिस्थितिक लागत का आंकलन बेहद जिम्मेदारी से करना होगा।”
सुनीता नारायण (Centre for Science and Environment)
Nuclear Plant परियोजनाएं तभी न्यायसंगत मानी जाएंगी, जब प्रभावित लोगों को सम्मानजनक पुनर्वास, स्थायी आय और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी दी जाए।”
NPCIL अधिकारी (गोपनीयता अनुरोध पर)
“हमने भूमि सर्वे और वन्यजीवों के आकलन की प्रक्रिया पूरी की है। एनवायरनमेंट क्लियरेंस के बाद लोकल लोगों से संवाद तेज़ी से शुरू किया जाएगा।”
नीति-निर्माताओं के लिए सुझाव
1. वन मंजूरी की प्रक्रिया पारदर्शी हो – ताकि लोगों का भरोसा बना रहे
- प्रभावित लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास के पैकेज तय हों
3. विकल्पों की खोज – जैसे यदि स्थान बदलने की संभावना हो तो पहले उसका मूल्यांकन
- रेडियोएक्टिव कचरे के दीर्घकालिक निपटान पर स्पष्ट नीति हो
संयुक्त संसदीय निगरानी समिति का गठन – जिससे पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित हो
पत्रकारिता और जन विमर्श की भूमिका
इस तरह की Nuclear Plant परियोजनाएं जन-जीवन से गहराई से जुड़ी होती हैं। मीडिया का कार्य होना चाहिए कि:
सिर्फ सरकारी बयानों पर निर्भर न रहे
जमीनी हकीकत की रिपोर्टिंग करे
लोकल भाषा में डिबेट और संवाद शुरू करे
प्रभावित परिवारों की आवाज़ को मंच दे
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे ट्विटर, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर भी जागरूकता की बड़ी भूमिका बन सकती है।
निष्कर्ष: सतत विकास की राह पर संतुलन का संग्राम
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में प्रस्तावित माही-बांसवाड़ा परमाणु ऊर्जा परियोजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और हरित भविष्य की दिशा में एक अहम कदम मानी जा सकती है।
Forest Advisory Committee द्वारा Nuclear Plant परियोजना को वन मंजूरी देने पर विचार करना यह दर्शाता है कि अब यह योजना नीतिगत फैसलों के निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।
हालांकि, इस Nuclear Plant परियोजना की सफलता केवल तकनीकी मंजूरी या निर्माण की शुरुआत से नहीं, बल्कि जन सहभागिता, पारदर्शिता, पर्यावरणीय संरक्षण और सामाजिक न्याय से तय होगी।
वन भूमि के उपयोग, वन्यजीवों पर प्रभाव, विस्थापन की चुनौतियाँ और रेडियोधर्मी कचरे के प्रबंधन जैसे विषय सरकार के लिए नीतिगत और नैतिक कसौटी हैं।
यदि सरकार इस Nuclear Plant परियोजना में सभी हितधारकों—स्थानीय आदिवासी समुदाय, पर्यावरणविद, वैज्ञानिक, और नीति-निर्माता—को एक साथ जोड़कर चलती है
और दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखकर काम करती है, तो यह न केवल एक ऊर्जा परियोजना होगी, बल्कि भारत के सतत विकास और उत्तरदायी लोकतंत्र का प्रतीक बन सकती है।
इसलिए जरूरी है कि:
Nuclear Plant परियोजना में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो
पारिस्थितिकी और जैव विविधता की रक्षा की जाए
और यह पूरी प्रक्रिया विश्वास, संवेदनशीलता और जवाबदेही के साथ आगे बढ़े
तभी यह Nuclear Plant परियोजना ‘विकास बनाम विनाश’ की बहस से निकलकर ‘विकास के साथ संरक्षण’ की मिसाल बन सकेगी।
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